लोग बुरा वक्त इस उम्मीद में काटते हैं कि कभी तो उनका अच्छा वक्त आएया तब सब कुछ उनके अनुकूल होगा जिंदगी आनंद दायक हो जाएगी जिनका वक्त बदल जाता है उनकी तो हर इच्छा पूरी होने लगती हैं पर जिनका वक्त नहीं बदलता वे इंतजार करते ही रह जाते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो सुनहरे वक्त को बिताकर गर्दिश के दौर को काट रहे होते हैं ऐसे लोग इतनी बुरी तरह से बर्बाद होते हैं कि उनकी दुबारा सँवरने की संभावना हो समाप्त हो जाती है।
दौलत राय कभी शहर के जाने माने ज्वेलर थे समाज में उनका बड़ा सम्मान था वे नगर परिषद में पार्षद भी थे। सब कुछ ठीक चल रहा था तभी विधान सभा के चुनाव आए समर्थकों के कहने पर उन्होंने विधायक का चुनाव लड़ा उसमें अनाप शनाप पैसा खर्च किया फिर भी चुनाव हार गए फार्म हाउस बिक गया दो मकान बिक गए फिर भी करोड़ों रुपये का कर्ज सिर पर था जवेलर की दुकान लड़के ने सम्हाल रखी थी । लेनदारों ने उनकी दुकान पर कब्जा करना चाहा तो बेटे ने कागजात दिखाकर बताया कि यह दुकान तो मेरी है। यह सुनकर लेनदार तो मायूस हो गए पर दौलतराम को भी सदमा लगा चुनाव की व्यस्तता का लाभ उठाकर लड़के ने उनके भरोसे का अनुचित फायदा लेकर उनसे संपत्ति हस्ताँतरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए थे। दौलतराम ने जब लडके से ज्यादा बहस की तो उसने उन्हें घर से निकाल दिया। अब वे अपनी पत्नी के साथ दंसरे शहर में किराये के मकान में रह रहे थे एक ज्वेलर की दौकान पर नौकरी कर रहे थे जिसकी उन्हें बारह हजार रुपये महीना तनख्वाह मिल रही थी। कहा जाता है कि वक्त अच्छा हो तो रंक भी राजा बन जाता है और अगर वक्त बिगड़ जाए तो राजा से रंक बनने में देर नहीं लगती।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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