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व्यंग्य : बेहतर की खोज में बेहतर को खो देना

अक्सर ऐसा होता है कि हालात भले ही कितने अच्छे हों फिर भी ज्यादातर लोग उससे संतुष्ट नहीं होते वे इससे बेहतर की खोज में रहते हैं वो जब उन्हें हासिल नहीं होता तब अपने गुजरे हुए बेहतर हालात का आनंद नहीं उठाने का अफ़सोस प्रकट करते हैं। ऐसे लोग उस जुआरी की तरह होते हैं जो अपनी जीती हुई रकम इस आस में दाँव पर लगा देता है कि वो जीतकर मालामाल हो जाएगा और जब हारने लगता है तो और%बढ़चढ़कर दाँव पव दाँव लगाता है । फिर पूरी तरह कंगाल होकर ही दम लेता है। जब किसी का अच्छा समय चल रहा होता है तब उसकी उन्पति के रास्ते खुल जाते हैं। और वो यह मान लेता है कि अब कभी असफलता तो उसके पास आएगी ही नहीं यह सफलता की चकाचौंध उसे अभिमानी और बददिमाग बना देती है जिससे उसे शिखर से शून्य तक आने में देर नहीं लगती इसके बाद वो लाख कोशिशें करता है पर कुछ हासिल नहीं होता तब उसे अपार दुख होता है जिसका सबसे बड़ा कारण वो खुद होता है। इसी तरह हम संबंधों को लेकर भी भूल करते हैं। और अच्छे दोस्त की तलाश में अच्छे दोस्त को खो देते हैं फिर कहीं के नहीं रहते  मंजू के बड़े बेटे की बहू सरला अच्छे स्वभाव की थी सबका ख्याल रखने वाल...

व्यंग्य: दुश्मनी का दिखावा

जिस तरह कुख लोग दोस्ती का दिखावा कर दुश्मनी पाले रहते हैं और अवसर की तलाश करते रहते हैं उसी तरह कुछ ऐसे भी होते हैं । जो दुश्मनी का दिखावा करते हैं जिससे उनकी दोस्ती होती है। उससे जाहिर तौर पर दुश्मन की तरह लड़ते हैं । पर यह बहुत बड़े झाँसे बाज होते हैं। इनकी दोस्ती जिससे होति है उसमें छल कपट छिद्र कूट कूट कर भरा होता है वो खुद भी ऐसे होते हैं धोखा दगा इनकी नस नस में भरा होता है यह जिसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं उससे दोस्ती का झूठा दिखावा करते हैं। उसके सामने यह आपस में खूब लड़ते हैं इनमें गर्मागर्म बहस भी होती है कभी कभी तो ऐसे लगता है कि इनमें कहीं खून खराबा न हो जाए अगला बीच बचाव करता है। फिर यह दोनों उससे एक दूसरे की बुराई करते हैं। उसके मन की बात जानते हैं फिर लोग उनके बारे भें क्या सोचते हैं यह मालूम करते हैं। दूसरे दिन शाम को आपस मे एक दूसरे की जान के प्यासे होकर लड़ने वाले गले मे हाथ डालकर घूमते हुए नजर आते हैं। खूब घुट गुटकर बाते करते हैं दोनों की बाते छल कपट भरी होती हैं। इसके बाद यह दोनों मिलकर सबसे ज्यादा क्षति उसे पहुँचाते हैं जिससे यह दोस्ती का दिखावा कर रहे थे। ...

व्यंग्य: हर हाल में संबंधों का निर्वाह जरूरी तो नहीं

कभी कभी रिशते निभाना हमारी गले में अटकी हड़डी की तरह पीड़ा दायक हो जाते हैं फिर भी हम उन्हें निभाते हैं कभी इसकी हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है क्या इस तरह से संबंधों का निर्वाह जरूरी है। कई बार तो इनमें जान दाँव पर लगाने की । नौबत तक आ जाती है। इस संबंध में एक घटना याद आ रही है जिसका उल्लेख करना यहाँ उचित होगा। हरिप्रसाद के साले अनोखी लाल के लड़के का मुंडन समारोह था हरिप्रसाद का उस समय बहुत जरूरी काम पड़ रहा था। साले का व्यवहार भी ठीक नहीं था उसकी इच्छा आयोजन में शामिल होने की नहीं थी पत्नी और बच्चे जा हो रहे थे लेकिन उसकी पत्नी ने ऊँच नीच समझाकर उसे आयोजन में शामिल होने पर विवश कर दिया वो अपना केरियर दाँव पर लगाकर आयोजन में शामिल हुआ वे लोग अच्छे नहीं थे उसकी उन्होंने खास पूछ परख नहीं की। साले का सार्वजनिक नल पर पानी को लेकर एक परिवार से झगड़ा हो गया । झगड़ा इतना बड़ा की साले ने उस महिला के पति पर चाकू से हमला कर दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई । तब हरिप्रसाद वहाँ नही था लेकिन उसका नाम भी हत्या रों के साथ लिखवा दिया गया। उसकी एक नहीं सुनी गई और उसे आजीवन कारावास की सजा हो ...

व्यंग्य: अधूरी खुशियाँ

आधुनिक सुख सुविधाओं से भरे इस दौर ने जहाँ खुशियों की मात्रा घटा दी हैं वहीं खुशियों को भी अधूरा कर दिया है। अभाव में थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती है वहीं संपन्नता में बड़ी बड़ी खुशियाँ भी बौनी हो जाती हैं। जैसे सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार अगर साधारण कार भी खरीद ले तो उसके परिवार की खुशियों का ठिकाना नहीं रहता दूसरी अति संपन्न लोग करोड़ों की कार भी खरीद लें तो भी उनको वैसी खुशी नहीं मिलती ऐसे लोगों को नर्म मुलायम बिस्तर पर भी नींद नहीं आती। जो लोग बुरे काम करते है अनीतीपूर्वक धन कमाते हैं दुखी लाचार बेबस को सताते हैं उनका शोषण करते हैं उनकी हर ख़ुशी अधूरी होती है। खुशियों के मापदण्ड ऐसे लोगों की समझ से परे रहते हैं। जीवन सुख पूर्ण हो आनंद से भरा रहे खुशियाँ हर पल मौजूद रहे ऐसा सभी चाहते हैं पर कितने लोग सुखी रह पाते हैं क्षेत्रीय विधायक कौशल जी के पास आज हर प्रकार की सुख सुविधाएँ हैं फिर भी वे खुश नहीं है। उन्हे रह रहकर अपने वै दिन याद आते हैं। जब वे मजदूर थे तब थोड़ी खुशी भी बड़ी लगती थी कोई मोटर सायकिल पर बिठा ले तो बहुत मजा आता था। आज ऐसा नहीं होता। आपधापी दौड़धूप भरी जिंदगी मे...

व्यंग्य: समय की करवट

इस बात से तो सभी सहमत होंगे की समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कभी अच्छा समय होता है तो कभी बुरा और यह कब करवट बदल ले यह कोई जान नहीं सकता। कहते हैं कि समय अच्छा होतो फकीर भी बादशाह बन जाता है और समय अगर खराब हो जाए तो बादशाह को भी फकीर बनते देर नहीं लगती। जरा हम उन लोगों के विषय में सोचें जिनका समय अच्छा चल%रहा है। वे बहुत प्रभाव शाली हैं समाज में उनका रुतबा है मान है पूछ परख है। इससे उनमें अभिमान आ गया है वे खुद को खूब बड़ा समझने लगे हैं लोगों को हिकारत की नजर से देखते हैं किसी की भी बेइज्जती करने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता वे घमंडी हो गए हैं इस घमंड ने उनको यह विश्वास दिला दिया है कि वे हमेशा ही ऐसे रहेंगे। इसी भ्रम में वे जी रहे हैं लेकिन वे यह नहीं जानते जब वक्त करवट लेगा तो उनका क्या होगा हरी भरी बेल भी तो आखिर सूख ही जाती है। बुरे वक्त में उनके अपने भी उनका साथ छोड़ जाएँगे गुमनामी की जिंदगी जीना पड़ेगी और अंत बड़ा खराब होगा। लेकिन इसकी वे कभी कल्पना नहीं करेंगे। वे यह मान लेंगे कि ऐसा उनके साथ कभी नहीं होगा । और जब हो जाएगा तो उसके लिए वे तैयार नहीं होंगे। एक बड़ी क...

व्यंग्य: भाईयों का वैर

एक तरफ जहाँ आपस में भाईचारा रखने की बात होती है दूसरी तरफ सगे भाईयों में भी वैर होता हुआ देखा गया है। इनकी आपस की दुश्मनी देखकर तो दुश्मन भी दंग रह जाते हैं। जमीन जायदाद का बँटवारा तो हो जाता है। लेकिन एक दूसरे की जमीन मकान तो पास पास ही होते हैं कभी खेत की मेढ़ को लेकर तो कभी पालतू पशु द्वारा नुक्सान कर देने पर इनके बीच आए दिन झगड़े होते रहते हैं। यह झगड़े कभी कभी खूनी संघर्ष में बदल जाते है। कभी कभी तो किसी की जान भी चली जाती है। पिछले दिनों अस्पताल जाना हुआ वहाँ रमेश चंद्र जी भर्ती थे जो ठेकेदारी करते थे। उनके सगे भतीजे ने उन पर हमला कर दिया था उनके सिर में बारह टाँके लगे थे अंदरूनी चोट भी लगी थी भतीजे ने उन्हें बेरहमी से पीटा था। उन्हें इस बात का दुख था कि जिसे बड़े लाड़ से पाला था उसी ने बढ़े होकर उन पर जानलेवा हमला कर दिया था। इससे ज्यादा दुख की बात तो यह थी कि उनका सगा भाई भी अपने बेटे का पक्ष ले रहा था । उनकी भाभी जिसका घर उजड़ने से उन्होंने बचाया था उसी के कहने पर उसके बैटे ने रमेश पर जानलेवा हमला किया था। सबसे ज्यादा दुखी तो माँ थी वो रो भी नहीं सकती थी। इस घटना के बाद ...

व्यंग्य: खोटीं की चमक

अक्सर खरे से खोटे ज्यादा चमकदार होते हैं वे अपनी चमक से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं और उनकी चमक से प्रभावित होकर लोग खरे को छोड़कर खोटे को अपना लेते हैं। खरे खोटे की परख तो पारखी ही कर सकता है। और पारखियों की तो वैसे ही कमी बनी रहती है इसिलिए हीरे तो धूल में पड़े रहते हैं और काँच के टुकड़े हीरे मान लिए जाते हैं। यह खोटे लोग खरे को आगे नहीं बढ़ने देते उनके सारे अवसरों को झटक लेते हैं जहाँ पर खरों को होना चाहिए वहाँ ये खोटे नजर आते हैं। सारे सम्मान ये हड़प लेते हैं खरों को जो पदवी मिलना चाहिए ये उसे हासिल कर लेते हैं। एक पत्रिका के संपादक इस बात से दुखी थे कि रचनाओं का स्तर दिनों दिन गिरता जा रहा है। अच्छे कवि लेखकों की बड़ी कमी है हमने उनसे कहा कि आप कितने रचनाकार की रचनाएँ छापते हैं वे बोवे मुश्किल से आठ की इसके अलावा कोई स्तरीय मिलता ही नहीं है हमने कहा आप खोज ही नहीं करते। जो आपको सहज उपलब्ध हो गए उनको महत्व दे रहे हैं उनके बारे में जरा छानबीन तो करो वे बोले इतना समय किस के पास है हमारे पास और भी काम है। ये आठ लोग वे थे जिनका ग्रुप बना हुआ था उस ग्रुप में पत...