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व्यंग्य : बेवज़्ह खिल्ली उड़ाने वाले

जिन के पास कोई काम नहीं होता या काम नहीं करना चाहते या जो जोखिम लेने से बचते हैं आराम तलब होते हैं वे काम करने वाले मेहनती की बिना कारण खिल्ली उड़ा कर अपने आप को सही ठहराते हैं तथा उसे मजाक का पात्र बनाकर ख़ुश होते रहते हैं। जबकि जिसे गरीबी के अभिशाप से मुक्ति पाने की चाह होती है वो सिर्फ अपने काम से मतलब रखता है। वो किसी ऐसे व्यक्ति की परवाह नहीं करता जो खुद लूजर होकर उसकी खिल्ली उड़ाता हो।
कुछ लोग मेहनत से धन कमाते हैं । और ओवर टाइम करने से भी नहीं घबराते तथा फिजूल खर्ची से बचकर रहते हैं वे अपनी गरीबी के अभिशाप से जल्दी मुक्ति पा लेते हैं। चंद्रकाँत ने दिनभर काम किया था खाना खाचर शाम को वो चौराहे तक टहलने आया था वहाँ कुछ लोग ताश खेल?रहे थे ताश खेलते हुए उन्हें पूरा दिन हो गया था। चंद्र कांत थोड़ी देर के लिए वहाँ रुका तभी मोहन वहाँ आया वो बोला गन्ने की ट्राली भरना है चार लोगों की जरूरत है दो झंटे का काम है हर एक को पूरे चार सौ रुपये मिलेंगे। यह सुनकर ताश छेलने वालों में से कोई टस से मस तक नहीं हुआ किसी ने उसकी बात पर ध्यान तक नहीं दिया पर चंद्रकांत तैयार हो गया। हारकर दोनों ट्राली भरने आए ट्राली मालिक ने कहा हमें तो ट्राली भरवाने से मतलब है सोलह सौ रुपये मिलेंगे काम के बाद आपस में बाँट लेना। पूरे तीन घंटे में उन्होंने पूरी ट्राली भर दी थी च॔द्कांत को आठ सौ रुपये मिले थे जो उसकी पूरे दिन की मजदूरी के बराबर थे। रात को दस बजे वो घर पहुँचा पत्नी ने हल्दी मिला दूध का गिलास उसे दिया जिसे पीकर वो सो गया सुब्ह उसकी सारी थकान दूर हो गई थी। च॔द्रकांत ने चार साल में कुटीर?उद्योग खोल लियि था जिसमें चार लोग काम कर रहे थे और वो धीरे धीरे अपनी गरीबी से मुक्ति पा रहा था। और उसकी खिल्ली उड़ाने जहाँ के तहाँ थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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