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व्यंग्य : तानाशाह

जो हद दर्जे के अहंकारी अपने आपको सबसे अक्लमंद बाकी सभी को मूर्ख समझने वाले होते हैं वे तानशाह से कम नहीं होते इनके साथ जो रहते हैं वो प्रायः इनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले होते हैं चाहे उसमें सामने वाले का कितना ही नुक्सान क्यों न हो। 
जिनका रवैया तानाशाही होता है वो कितना ही नुक्सान उठा लें पर अपनी गलती मानने को तैयार ही नहीं होते । उन्में से कुछ लोग होते हैं जो किसी को बोलने का मौका ही नहीं देते बस अपनी सुनाए जाते हैं फिर अंतिम निर्णय भी दे देते हैं कोई तर्क अथवा बहस की कोई गुंजाइश नहीं रखते। इस तरह के लोगों में निशा भी शामिल थी । एक बार क्या हुआ कि वो अपने सगे संबंधियों के साथ किसी तीर्थ यात्रा पर गए वहाँ भी निशा ने किसी की नहीं चलने दी। किसी ने कुछ कहने की कोशिश भी की तो उसे बेइज्जत होना पड़ा। उसके पति अनिल की तो उसने सबके सामने बड़ी बेइज्जती की अनिल को किसी ने बताया था कि यहाँ एक सेवा संस्थान द्वारा मात्र दस रुपये भें भरपेट गरमागरम भोजन मिलता है जिसमें मिष्ठान्न भी शामिल होता है उससे अच्छा भोजन आठ सौ रुपये की रेस्टोरेन्ट की थाली में भी नहीं मिलता। काउण्टर खुला हुआ था कूपन मिल रहे थे जिनके खत्म होने पर काउण्टर बंद कर दिया जाता था। अनिल ने तुरंत लाइन में लगकर?बारह कूपन ले लिए। मात्र एक सौ बीस रुपये जब अनिल भोजन के लिए सबको वहाँ लाया तो निशा भड़क गई। बोली भिखारी समझ रखा है क्या यहाँ भोजन करेंगे हम भिखारियों के साथ तुम्हें शर्म नहीं आई उसने अनिल की एक नहीं सुनी। आखिर अनिल को वे कूपन एक ग्रुप को देना पड़े वो ग्रुप कूपन न मिलने से मायूस था उन्हें जैसे ही कूपन मिले उनके चेहरे खिल गए इधर इनका भूख के मारे बुरा हाल था ये भोजन की तलाश मैं बड़े रेस्टोरेन्ट में गए वहाँ भी निशा ने मीन मेख निकाली जो रेस्टोरेन्ट उसे समझ आया वहाँ खाना समाप्त हो गया था । उसने आधा घंटे इनसे प्रतीक्षा कराई फिर कच्चा पक्का बचा खुचा भोजन इन्हें परोस दिया। सब भूख से बिल बिला रहे थे तो भोजन पर टूट पडे जब पेट भरा तब समझ आया कि उन्होंने घटिया भोजन किया है जिसका पन्द्रह हज़ार रुपये का बिल आया उसका भुगतान करना पड़ा। वो भोजन किसी को हजम नहीं हुआ सब फूड पाइजनिंग के शिकार हो गए तब भी निशा के अनुसार मँहगे अस्पताल में इलाज कराना पड़ा जिसका तीन दिन का बिल साढ़े सात लाख रुपया आया। यात्रा बीच में छोड़कर घर आना पड़ा फिर भी निशा अपनी गलती मानने को तैयार नहीं थी न उसे कोई पछतावा था। क्योकि उसका अहं बीच में आ रहा था किसी की उससे कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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