सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : गुड़ी गाँठ

जो सहज सरल स्वभाव के धनी होते हैं वे अपने मन को हमेशा साफ रखते हैं दुश्मन के प्रति भी उनके मन में कोई बुरा भाव नहीं होता। पर जो कुटिल होते हैं वे ज़रा सी बात पर भी गुड़ी गाँठ पाल कर अपने मन में रख लेते हैं और जब तक अपनी पूरी कसर नहीं निकाल लेते तब तक इन्हें जरा सा भी चैन नहीं मिलता यह दस गुना बदला निकाले बिना नहीं मानते।जो लोग ऐसे लोगों की फितरत को जान लेते हैं वे इनसे बहुत सँभलकर रहते हैं।
फिर भी जाने अनजाने में अगर कोई चूक हो जाए और वो इनके दिल पर लग जाए तो समझो सामने वाले की खैर नहीं । इसके लिए ये किसी भी हद तक गुज़रने में जरा सी भी देर नहीं करते।
ऐसे ही एक स्वनामधन्य कवि थे अनाम जी एक कवि गोष्ठी में एक युवा कवि ने कुछ ऐसी टिप्पणी कर दी जो उन्होंने अपने ऊपर ले ली जबकि उस कवि की ऐसी मंशा भी नहीं थी । जब अनाम जी की बारी आई तो वे फट पड़े उस कवि की कविता को उन्होंने घटिया स्तरहीन निरूपित कर दिया उस कवि के खिलाफ अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया वे कवि बुरी तरह आहत थे अपमान का कड़वा घूँट पी रहे थे ।कार्यक्रम के बाद जब युवा कवि ने उनसे माफी माँगी तब भी वे उस पर उबल गए लाल पीली आँखें निकाल कर उन्होंने उस कवि की अच्छी ख़बर ली। तबसे उनमें स्थायी रूप से मनमुटाव हो गया है। अनाम जी से जुड़ी एक ओर घटना है। जिसमें हँसी मजाक में एक कार्यक्रम में कवि गगन ने परिहास में उन पर?एक कविता सुना दी अनाम जी इससे बड़े कुपित हुए गगन जी वरिष्ठ थे इसलिए वे खुलकर?कुछ कह नहीं सके पर गुड़ी गाँठ तो पढ़ ही चुकी थी। उसकी कसर निकालने के लिए उन्होंने पूरे अठ्ठाइस हज़ार रुपये अपनी जेब से खर्च कर दिए। एक कार्यक्रम आयोजित कराया दाल बाफले लड्डू बनवाए गए कार्यक्रम में वही मुख्य?अतिथि तथा अध्यक्ष बनाए गए जो गगन जी के कार्यक्रम में थै। पूरे पाँच दिन काफी बौद्धिक श्रम करके उन्होंने गगन जी के खिलाफ चविता लिखी उस कार्यक्रम में गगन जी की उपस्थिति में जब उन्होंने उस कविता का पाठ किया तब उनके मन को अपार संतोष मिला। हाँलाकि इसके बाद गगन जी और अनाम जी के संबंध पूरी तरह ख़त्म हो गए थे।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

कहानी: मिर्च का भाव

महानगर के न्यू मार्केद के एक हिस्से पर गाँव से आए कुछ किसानों की एक दर्जन सब्जी फल फूल की दुकाने थीं उनमें जो सबसे बड़ी दुकान थी वो किशनलाल पटेल की थी सभी किसान बमूलिया गाँ के थे जो महानगर से पच्चीस किलोमीटर दूर था पिछले पाँच सालों से वे ये दुकान लगा रहे थे और सभी खूब संपन्न थे वे सब अपने खुद के खेत में उपजी सब्जी फल फूल बेचते थे । इसमें बिचौलियों की कोई भूमिका नहीं थी सब्जी सीधे उत्पादक द्वारा ग्राहकों तक प हुँचती उचित भाव से ताजी सब्जी लेकर ग्राहक भी बहुत खुश होते थे यही कारण था कि सुब्ह शाम न्यू मार्केट के उस सब्जी फल वाले कार्नर पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी रात के आठ बजे तक पूरी सब्जी बिक जाती थी आज भी किशनलाल सब्जी बेचकर बमूलिया आए थे रात के नौ बजने वाले थे सब्जी उत्पादक के साथ ही फुटकर विक्रेता बनने से आज वे करोड़पति किसान बन गए थे उनका घर गाँव में सबसे आलीशान था। किशन लाल आज जो बिक्री हुई थी उसका हिसा जोड़ रहे थे पूरे डेढ लाख रुपये की सब्जी बिकी थी उन्होने हिसाब लगाया यदि यही सब्जी वे दलालों को देकर आते तो इस के मुश्किल से तीस हज़ार रुपये ही मिलते जिसमें प हजार र...

व्यंग्य: मतलबी अपने वाले

पुराने नैतिक मूल्यों के क्षरण के इस दौर ऐसे मतलबी लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जो बिना मतलब के किसी से किसी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं रखते। जिससे इनका मतलब होता है उसका थूक तक झेलने को तत्पर हो जाते हैं यह फिर पक्के सेवा भावी बन जाते हैं इनका सेवाभाव देखने लायक होता है ।सामने वाला इनको चाहे जुतियाए चाहे गरियाए चाहे इनकी लाख बेइज्जती कर दे पर इनके चेहरे की मुस्कुराहट में परिवर्तन नही होता ।यह सब मतलब रहने तक सीभित रहता है ।मतलब निकल जाने पर यह लोग फिर उस तरफ मुड़कर भी नसीं देखते ये लोग पक्के अहसान फरामोश होते हैं ये चापलूस लोग योग्य लोगों के हकों पर डाका डालने में जरा भी संकोच नहीं करते। जब यह बात हम अपने मित्र दिनेश से कर रहे थे तब करन खेड़ा गाँव के सरपंच हमारी बात बड़े गौर से सुन रहे थे वे हमारे पास आए और बोले आप बिल्कुल सही कह रहे हो ऐसे एक मतलबी अपने वाले से मैंने मुश्किल से पीछा छुड़ाया है उसने मेरी छवि का बहुत नाजायज फायदा उठाया यह सुनकर?हमारी जिज्ञासा बढी तब उन्होंने विस्तार से बताया हमारा सगा साला है बाबूलाल जो आजकल जेल की हवा खा रहा है । तीन साल पहले वो ह...