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व्यंग्य : बदला

जिस तरह दिवाली पर कुछ लोग जुआ खेलते हैं कि जो कि एक बुराई हे। उसमें जो बड़ी रकम हार जाते हैं उसकी क्षतिपूर्ती करने में उन्हें पूरा साल लग जाता है उसी तरह होली पर लोगो को दुश्मनी निकालने का मौका मिल जाता है होली की आड़ में वे अपने दुश्मन की तबियत से पिटाई करके अपना बदला निकाल लेते हैं । तभी तो यह कहावत चल गई कि दिवाली का लुटा और होली के पिटे के ठीक होने में पूरा साल लग जाता है।
कुछ लोगों बदला निकालने की भावना बहुत तीव्र होते हैं जब तक यह अपना बदला नहीं निकाल लें ते तब तक उन्हें चैन नहीं पड़ता सुरेश को कक्षा में शिक्षक की मार?खाना पड़ी वहीं राकेश खड़ा था । सुरेश ने यह मान लिया कि राकेश के कारण उसकी पिटाई हुई। उसके मन में बदला लेने की भावना तीव्र हो गई । उसने छल कपट से राकेश को अपने साथ ले लिया अपने चार दोस्तों को भी इशारा कर दिया फिर किसी खँडहर में?सुन सान जगह उसके और उसके दोस्तों ने मिलकर राकेश की खूब पिटाई कर दी तब कहीं उसके मन को चैन मिला। कई लोग ऐसे होते हैं जो बात तो भले की करते हैं पर वो होती है बहुत कड़वी।
जो कुछ लोगों को बुरी लगती है और वो उसका बदला भी निकालते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कितनी ही बड़ी कीमत अदा करना पडे । राजेश अपने बूढ़े पिता को बहुत तंग करता था लोगों को दया आती तो कहता ये दया के काबिल नहीं इसने मुझे बचपन में बहुत परेशान किया है । मझे जरा सी बात पर बहुत मारा है अब जाकर मुझे मौका मिला है। तो अपनी कसर निकाल रहा हूँ । इन्होंने मुझ पर बेहिसाफ जुल्म किए। हैं इसिलिए मुझे भी इन्हें परेशान करने में अदभुत सुख की प्राप्ति होती है। जिसका शब्दो में वर्णन नहीं किया जा सकता 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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