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व्यंग्य : सफलता की चमक

सफलत की चमक लोगों को भले ही चकाचौंध कर दे पर जिसको सफलता भिलती है उससे पूछो इसके लिए उसने कितने प्रयास किए हैं। सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता यह कठोर?परिश्रम लग्न से प्राप्त होती है जो सफल होता है वो सोने की तरह खरा होता है। हीरा कितना ही कठोर क्यों न हो उसे भी अगर तराशा न जाए तो वह भी अपनी पूरी चमक नहीं बिखरा सकता। ।
पारखी कहते हैं कि सोने में प्राकृतिक रूप से कोई खोट नहीं होती यही उसकी विशेषता होती है और यही उसकी चमक का सबसे बड़ा कारण जो किसी भी हाल में फीकी नहीं होती ना ही सोने में कभी जंग लगती है। सोने में खोट अगर मिला भी दी जाए तो उसे इतना तपाया जाता है कि खोट सारी जलकर राख हो जातो है पर सोने में और अधिक निखार आ जाता है।
शेखर जब कलेक्टर बनकर जिला मुख्यालय पर आए कार्यभार ग्रहण करने के बाद जब उन्होंने स्टॉफ के सदस्यों से परिचय प्राप्त किया तो अपने सहपाठी सुधीर को देखकर चौंक गए। सुधीर ने स्नातक परीक्षा में बहत्तर प्रतिशत?अंक प्राप्त कैए थे जबकि उनके अठ्ठावन प्रतिशत अंक आए थे उसका सबसे बड़ा कारण था कि सुधीर के चाचा यूनिवर्सिटी में सेवारत थे उनके कारण षुधीर के इतने अंक आए थे। इसके बाद शेखर यू पी एस सी की तैयारी में जुट गए सुधीर ने अपने पिता के राजनैतिक संपर्कों का लाभ उठाकर कलेक्ट्रेट में कार्यालय सहायक की नौकरी पा ली थी जबकि शेखर ने कठोर परिश्रम कर के यु पी एस सी क्लीयर की थी तथा आइ एस एस का केडर प्राप्त किया था। सुधीर को पहली बार शेखर को देखकर शर्मिंदगी हो रही थी। उसे अपने ग्रेजुएशन के बहत्तर प्रतिशत अंक क्लर्क भी नहीं बना पाते अगर वो सोर्स नहीं लगवाता तो जबकि शेखर ने अपनी मेहनत और लगन से कलेक्टर का पद प्राप्त किया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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