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व्यंग्य : अपनों का दिया दंश

अपने वाले अगर अच्छे न हों हों तो उनसे अधिक दुख देने वाला कोई ओर नहीं होता अपनों का दिया दंश बहुत?पीड़ा जनक होता है खासकर अपने करीबी रिश्तेदार हों। अब तो यह भी देखा जा रहा है कि पति पत्नी के बीच अगर प्रेम खत्म हो गया हो तो वो एक दूसरे का सताने के अवसर तलाशते रहते हैं। 
कई परिवारों में कोई बेटा माँ बाप का ज्यादा चहेता होता है और कोई उपेक्षित जो चहेता होता है वो उपेक्षित को परेशान करता है। और माता पिता भी इसे नजर?अंदाज कर?जाते हैं चहेता अगर उपेक्षित की झूठी शिकायत भी कर दे तो उसे सही मान लिया जाता है । और उपेक्षित को बिना किसी कसूर के कड़ी सजा मिल जाती है जिसे देखकर चहेते को पैशाचिक आनंद की अनुभूति होती है। दूसरी ओर यदि उपेक्षित चहेते की सही शिकायत भी कर दे तो उसे झूठी मानकर?उसे ही प्रताड़ित किया जाता है। इनसा दुखी और कोई नहीं होता क्योंकि ये अपनों के अत्याचार कै शिकार होते हैं। ये अगर घंटों आँसू भी बहाएँ तब भी इनके सगे अपनों का ह्रदय नहीं पसीजता। जबकि चहेता अगर जरा भी उदास हो तो पूरा घर दुखी हो जाता हैं और?उसको खुश करने का प्रयास करता है अगर वो इसका कारण उपेक्षित के द्वारा परेशान करना बता दे तो उपेक्षित की समझो शामत ही आ जाती है।
घनश्याम जी का तबादला दूरस्थ स्थान पर हो गया था। उनके चाचाजी ग्राम स्तर के नेता थे और?विधायक जी के मुँह लगे थे । घनश्याम जी अपना तबादला रुकवाने के लिए अपने चाचाजी को ले जाते थे पर काम बनता नहीं था। एक दिन ऑफिस के उमेश बाबू ने उनसे धीरे से कहा कि अगली बार आओ तो चाचा को लेकर मत आना और जब घनश्याम जी अकेले ऑफिस में आए तब चाचा की करतूत सुनकर सकते आ गए। उनका तबादला चाचाजी ने हीं कराया था। और वे ही तबादला आदेश को निरस्त नहीं होने दे रहे थे। मुँह पर मीठा बोलने वाले चाचाजी की उनके प्रति इतनी कड़वाहट है जिसका उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था फिर?उन्होंने अपने स्तर पर अपना काम कर लिया जिसे देखकर चाचा के कलेजे पर साँप लोटने लगा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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