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व्यंग्य : अड़गेबाज

कहते हैं कि बुरे काम होने में देर नहीं लगती पर अच्छा करने जाओ तो हज़ार रुकावटें सामने आते हैं नित?नई परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं ।मन भी डगमगा जाता है। हतोत्साहित करने वाले भी बहुत?मिल जाते हैं। इनसे सबसे ज्यादा बुरे वे लोग होते हैं जो अड़ंगा लगाते हैं किसी के बने हुए काम बिगाड़ने में इन्हें अपार सुख की प्राप्ति होती है।
इनके सामने कोई अपनी परेशानी बताए तो इन्हें अच्छा लगता है और कोई इनसे अपनी खुशखबरी शेयर करे तो इनके तन बदन में आग लग जाती है इन्हें कीसो की ख़ुशी अच्छी नहीं लगती।
राधेश्याम जी किराये के मकान में रहते थे ऐसे रहते हुए इन्हें दस साल हो गए थे। राधेश्याम जी ने एक आवासीय भूखण्ड देखा था जो बिकाऊ था। उसकी कीमत पन्द्रह लाख रुपये थी। उन्होंने दस लाख रुपये की व्यवस्था तो कर ली थी लेकिन पाँच लाख रुपये कम पड़ रहे थे। वे इसी उधेड़बुन में थे चि कहीं से पाँच लाख रुपये का बंदोबस्त कैसे हो। उन्होंने एक से बात की थी वो डेढ़ परसेन्प मासिक ब्याज दर पर पैसे देने को तैयार हो गया था। भूखण्ड का सौदा शीघ्र होने वाला था। तभी उनसे एक चूक हो गई उनके परिचित चतुर सिंह से जब उनकी बात हुई तो चतरसिंह बोला अब तो मकान बनवा लो किराए से कब तक रहोगे राधेश्याम के मुँह से यह बात निकल गई कि एक भूखण्ड का सौदा किया है इतना सुनते ही चतर सिंह का खुराफाती दिमाग सक्रीय हो गया। उन्होंने राधेश्याम जी से सारी जानकारी ली फिर सबसे पहले कर्ज देने वाले को भड़काया उसने राधेश्याम जी को कर्ज देने से मना कर दिया बहुत मनाने पर?बोला पाँच परसेन्ट प्रतिमाह ब्याज के लगेंगे इतनी ऊँची ब्याज दर से वे घबरा गए पाँच लाख का पच्चीस हजार ब्याज बन रहा था मकान किराये का दस हजार दे रहें। थे चालीस हज़ार उनका वेतन था पाँच हजार बचते तो कैसे महीना निकालते। भूखण्ड मालिक के पास गए तो उसने तीन लाख रुपये कीमत?बढ़ा दी । वो भी चतर?सिंह के कहने पर। आखैर उस प्लाट का ससौदा रद्द हो गया तब कही उनके कलेजे को ठंडक पहुँची। 

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

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