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व्यंग्य : समरथ को नहीं दोष गुसाईँ

हमारे समाज की संरचना शायद कुछ ऐसी है जिसमें समर्थ को कोई दोषी नहीं ठहराता उसके अवगुणों को भी गुण मान लिया जाता है उसकी बड़ी गलतियाँ भी लोग नज़र अंदाज कर देते हैं। जबकि कमज़ोर की छोटी गलती को बढ़ा चढ़ाकर बडी बताई जाती है और उसे कड़ी सजा दे दी जाती है उसकी कहीं कोई सुनवाई भी नहीं होती।
कभी कभी ऐसा भी होता है कि कोई समर्थ जब गलती करता है तो उसका बदला छोटों से निकाला जाता है। उसे जबरन दोषी ठहराकर उसे इसकी कड़ी सजा दे दी जाती है।
छोटे लाल जमींदार के यहाँ हाली का काम करता था खेत में बनाए मालिक के दिए मकान में रहता था । एक दिन उसका नौ वर्ष का लड़का सतीश रोते हुए आया और बोला एक लड़के ने जब में खेल?रहा था तब मुझे अकारण आकर मारा और बहुत मारा कह रहा था कि तेरे बाप में भी इतनी हिम्मत नहीं है जो मेरा कुछ बिगाड़ सके। सुनकर छोटेलाल को बहुत गुस्सा आया उसने बाँस की पतली छड़ी उठाई ओर उस लड़के के पास आया। लेकिन लड़के को देखते ही उसके हाथ पैर ढीले पड़ गई हाथ की छड़ी छूट गई। बड़े अदब से बोला छोटे मालिक आप । वो लड़का छोटेलाल के मालिक का बेटा था शहर में रहता था नंब एक का घमंडी गरीबों से नफ़रत करने वाला । उसका नाम अवनीश था। फिर उसने अपने बेटे सतीश से कहा बेटे इनसे माफी माँगो ये छोटे मालिक हैं। सतीश यह देखकर चकरा गया बेबसी उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी आज उसकी गरीबी ने उसे इतना छोटा बना दिया था कि उसकी कोई हैसियत ही नहीं रही थी। पिताजी की हालत देखकर सतीश ने उस गलती की माफी माँग ली थी जो उसने की ही नहीं थी। और जो समरथ था वो भारी गलतियाँ करके भी तन के खड़ा हुआ था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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