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व्यंग्य : जली हुई रस्सी के बल

एक कहावत है कि रस्सी जल गई फिर भी उसके बल नहीं गए। । रस्सी तो राख में बदल गई औसे भले ही मसलकर धूल की तरह कर दें तो बल का नामोनिशा॔ ही न रहे। इसी तरह से कुछ लोग ऐसे होते हैं । जो किसी ताकतवर से जब लड़ते हैं तो अपनी कमजोरी पर ध्यान नहीं देते और उसको कमजोर समझने की भूल कर लड़ाई छेड़ देते हैं बार बार मात खाते हैं और फिर खड़े हो जाते सैं बलवान उसे पटखनी पर पटखनी देता है और वो उठकर फिर लड़ना शूरू कर देते हैं।
यह लड़ाई जब तक लड़ते रहते तब तक पूरी तरह बेदम न हो जाएँ। और इन्हें हराने वाला इनको पूरी तरह मिटा चुका होता है। इनमें समझदारी बिल्कुल नहीं होती लड़ाई करने की पहल इनकी और से ही होती है। और बुरी तरह हारते भी ये ही हैं।
एक मोहल्ले की बात है उसमें तरूण नाम का पहलवान था निहायत ही शरीफ पर लड़ने में सबसे तेज उसके सीधेपन को सरलता को एक दुबला पतला कमजोर सा इंसान जिसका नाम जीवन था कमजोरी समझ बैठा और उसे लड़ाई के लिए उकसाने लगा तरुण ने कई बार उसकी चुनौती को नजर अंदाज किया। इससे उसकी हिम्मत बढ़ती चली गई। आखिर एक दिन तरुण उसकी चुनौती स्वकार कर ली इसके बाद तरुण ने उसकी वो धुनाई कि कई महीनों तक तो वो ठीक से उठ बैठ भी नहीं पाया। फिर भी जली हुई रस्सी की तरह उसका बल भी नहीं गया था। जबकि उसमें अपने बराबर वाले से तड़ने की भी शक्ति नहीं बची थी। ऐसे लोग नए सिरे से शक्ति संचय करने में जुट जाते हैं और सामने वाले को हराने के सपने देखते रहते हैं जो कभी पूरी नहीं होते यह जींदगी की कड़वी हक़ीकत जिसमें झुठलाने का ऐसे लोग मूर्खता भरा प्रयास करते रहते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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