सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : ख़ुशी

आज के इस तनाव भरे जीवन में ख़ुशी बहुत दुर्लभ होती जा रही है लोग इतने तनाव में रहते हैं कि छोटी मोटी ख़ुशी उन पर कुछ असर नहीं डाल पाती है। बड़ी ख़ुशी भी वे ठीक से मना नहीं पाते हैं कोई उनकी ख़ुशी पर बधाई दे तो मुँह बनाकर बोलते हैं काहे की ख़ुशी कैसी ख़ुशी । फिर?बुरा मुँह बनाकर अपनी हज़ार परेशानियाँ गिनाने बैठ जाते हैं। और कुछ इस तरह से चित्रण करते हैं कि सुनने वाला जो बधाई देने आया था तब बड़ा ख़ुश मिजाज था अब गहरे दुख के सागर में डूबा दिखाई देने लगता है।
ऐसे लोग हमेशा रोनी सूरत बनाए हुए मिलेंगे। कभी किसी ने उन्हें खुलकर हँसते हुए नहीं देखा होगा यह जब घर में आते हैं। तो इनकी त्यौरी चड़ी होती है कभी बच्चों पर झल्लाते हैं तो कभी पत्नी पर अपनी खीझ निकालते हैं इनके आते ही घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे घर में कर्फ्यू लगा हो। जब यह घर से जाते हैं तो पूरे घर का माहौल बदल जाता है।
रस्तोगी साहब ने दो लाख में नई इलेक्ट्रिक स्कूटी ली थी। जिसमें डेढ़ लाख रुपये का लोन लिया था। उनके पास जो स्कूटी थी वो ठीक ठाक थी अच्छी चल रही थी मगर दिखावे के फेर मेअं उन्होंने यह इलेक्ट्रिक स्कूटी खरीदी पर इससे वे ख़ुश नही थे उन्हें इस बात का दुख था कि उनकी अच्छी भली पुरानी स्कूटी मात्र पन्द्रह हज़ार रुपये मैं कटी थी। इधर उनकी स्कूटी एक्सचेंज में गई उधर उसके खरीदार पहुँच गए शो रूम वाले ने वो स्कूटी उनके ही सामने बीस हजार रुपये में बेच दी। अपने सामने पाँच हजार रुपये का घाटा उनके लिए असहनीय था दूसरी ओर जिसने पुरानी स्कूटी खरीदी थी उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था उसके परिजन भी खुशी के मारे फूले नहीं समा रहे थे पुरानी स्कूटी पाकर भी वे बहुत खुश थे जबकि रस्तोगी साहब नई स्कूटी पाकर भी उतने खुश नहीं लग रहे थे।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...