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व्यंग्य : सही नेतृत्व की तलाश

आमतौर पर साधारण आदमी राजनीती से दूरी बनाकर रखना पसंद करते हैं कुछ लोग आगे नहीं आना चाहते जब सही लोग नेतृत्व से बचते हैं तो उसका फायदा गलत लोग उठाते हैं इसका नतीजायह होता है कि आपराधिक वृत्ति के लोग राजनीति में कूद पड़ते हैं और चुनाव जीतकर समाज विरोधी कार्यों में लिप्त हो जाते हैं।
कुछ कठपुतली टाइप के लोग कुछ अवसरवादी कुछ चापलूस राजनीति में आकर अराजकता फैलाते हैं सरकारी तंत्र?में अनुचित हस्तक्षेप करते हैं भ्रष्टाचार?में लिप्त होकर अनाप शनाप धन कमाते हैं। और आम आदमी के हक़ पर डाका डालते हैं झूठे वादे करते हैं झूठे आश्वासन देते हैं। किसी भी तरह से चुनाव जीतने में विश्वास करते हैं इनमें नैतिकता नाम को भी नहीं होती है। देश में अच्छे नेताओं की कमी है। जो हैं उनके दम पर हमारा देश इतनी तरक्की कर सका है।
महतपुर गाँव आसपास के पचास गाँवों में सबसे उन्नत गाँव था गाँव में शराब की दुकान नहीं थी ग्राम स्तर के सभी सरकारी कार्यालय गाँव में थे कोई गाँव में गाली गलौज नहीं करता गाँव में कभी कोई अपराध नहीं होता था इसका श्रेय ओंकार बाजी को जाता है वो पच्चीस साल तक गाँव के सरपंच रहै। उनके कार्यकाल में गाँव ने खूब तरक्की की । जब वे पैंसठ साल के हो गए तो उन्होंने नया नेतृत्व खड़ा कर एक अच्छे नवयुवक अशोक को सरपंच बनवाया। निर्विरोध निर्वाचन हुआ। अब ओंकार बाजी अस्सी साल के हो गए हैं मगर?अभी भी वे गाँव के सर्वमान्य नेता हैं उनकी मर्जी के बिना आज भी गाँव में कुछ नहीं होता। आसपास के गाँव वाले कहते हैं काश हमारे गाँव में भी कोई ओंकार बाजी जैसा नेता होता तो हमारा छाँव की टक्कर का कोई ओर गाँव नहीं होता । सही नेता की ताकत को कोई कभी खत्म नहीं कर सकता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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