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व्यंग्य : सरकारी नौकरी वाला दूलूहा

वैसे तो सरकारी नौकरी मिलना आसान नहीं है । पर जिनकी सरकारी नौकरी लग जाती हैं उनके यहाँ विवाह योग्य लड़कियों के माता पिता की भीड़ लगना शुरू हो जाती है उसी हिसाब से दहेज भी निर्धारित हो जाता है। ऐसे दूल्हे के पिता को अपने बेटे के लिए दुल्हन की तलाश नहीं करना पड़ती । ऐसे दूल्हों की संख्या बहुत कम होती है तथा विवाह योग्य लड़कियों की संख्या कई गुना अधिक ऐसे में जो सबसे अधिक रुपया देता है वो अपनी बेटी की शादी ऐसे दूल्हे से करने में सफल हो जाता है बाकी सब मायूस हो जाते हैं।
जिस तरह सरकारी नौकरी करने वाले लड़कों की पूछ होती है उसी तरह सरकारी नौकरी करने वाली लड़की के पिता के दिमाग भी सातवे आसमान पर होते हैं ऐसी लड़की से विवाह करने वाले लड़कों की संख्या कम नहीं होती वर पक्ष द्वारा इनको दहेज रहित शादी के ऑफर दिए जाते हैं ऐसी लड़की के नैन नक्श पर भी ध्यान नहीं दिया जाता सरकारी नौकरी की विशेषता ही ऐसी है जिसके सामने बाकी सब कुछ गौण हो जाता है।
विशाल एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था साठ हजार?रुपये वेतन मिल रहा था उसकी शादी अंजलि से लगभग तय हो गई थी लेकिन जब अंजलि को सरकारी नौकरी करने वाला लड़का मिल गया तो उसकी शादी उस लड़के से हो गई विशाल बड़ा दुखी हुआ । जबकि सरकारी नौकरी वाले को चालीस हजार रुपये वेतन मिल रहा था। फिर विशाल ने अपनी कंपनी में काम करने वाली लड़की तनु से शादी कर ली। शादी के दस साल हो गए थे दोनों ने अपनी निजी कंपनी खोल ली थी। जिससे वे धनवान हो गए थः। उनका जीवन स्तर?खूब ऊँचा हो गया था। एक दिन विशाल को अंजलि मिली जो एक निजी स्कूल में नौकरी कर रहि थी। पति रिश्वत खोरी के जुर्म के साबित?होने पर नौकरी से निकाल?दिया गया था तथा कहीं सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहा था अजलि की दयानीय दशा देखकर विशाल भी दुखी हो गया था इसके अलावा और वो कर ही क्या सकता था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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