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व्यंग्य : जड़ खोदने वाले

कुछ लोग स्वभाव से बुरे होते हैं इनके मन में ज़रा भी सद्बाव नहीं होता । यह किसी की तरक्की देखकर जल भुन कर खाक हो जाते हैं यह किसी आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते ये पेड़ों में पानी सींचना अच्छा नहीं मानते इन्हें तो किसी जमे जकड़े पेड़ की जड़े खोदने में बहुत मजा आता है। किसी पेड़ को जड़ से उखाड़कर भी दम नहीं लेते बल्कि बाकी बची जड़ों में भी मठ्ठा डाल देते हैं ताकि वो फिर से हरिया न सके। इनके साथ रहने वालों की भी कमी नहीं है इन्हें विध्न संतोषी भी कहा जाता है। इनका ह्रदय परिवर्तन कोई नहीं कर सकता यह लोग जीवन पर्यंत तक भी अपना स्वभाव नहीं बदल पाते। मरते मरते भी ये किसी न किसी का बुरा करने में सफल हो ही जाते हैं।
उमेश और महेश दोनों सगे भाई थे उमेश कुटिल स्वभाव का था महेश सीधे सरल स्वभाव का उमेश कामचोर भी 
था जबकि महेश मेहनती होने के साथ बुद्धिमान भी था तथा व्यावहारिक भी। दोनों को जायदाद में बराबर का हिस्सा मिला था। दोंनों के हिस्से में दस दस एकड़ जमीन आई थी साथ ही एक एक मकान भी। लेकिन आठ साल में उमेश अपने कुटिल स्वभाव के कारण कंगाल हो गया था मारपीट चोरी और लूटमार के जुर्म में जेल में था उसकी सारी जमीन जायदाद बिक गई थी । मकान गिरवी रखा था पूरे परिवार को जीने के लाले पड़े हुए थे। जबकि महेश के पास पच्चीस एकड़ जमीन थी बारह दुधारू पशु थे एक दुकान थी ट्रेक्टर भी था तथा एक बहा मकान गाँव में और?एक खेत पर बना हुआ था वो गाँव का सबसे सम्मानिय व्यक्ति था । गाँव में ऐसा कोई नही था जो उसके अहसानों तले न दबा हो दूसरी ओर?उमेश महेश की जड़ खोदते खोदते पूरी तरह बर्बाद हो गया था। बुरे मन वाले लोग कभी आगे नहीं बढ़ पाते यह दूसरों की टाँग खींचने के कारण पीछे ही रह जाते हैं।यह बात उमेश पर पूरी तरह से लागू होती थी।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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