सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

मार्च, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य : संबंधों की बेकद्री

दूसरों को ख़ुश करने के लिए कभी कभी कुछ लोग अपनों की बेकद्री कर देते हैं जो बाद में उनको बड़ी भारी पड़ती है। जो हमारा शुभचिंतक होता है वो हमें चाहता है इसलिए वो हमारी कड़वी बात भी हँसकर सहन कर लेता है और इसका फायदा उठाकर लोग उसकी बेकद्री करना शुरू कर देते हैं। लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि हर चीज की हद होती है जैसे ही हद पार होजाती है और पानी सर से गुज़र?जाता है। सबंधों की उसी वक्त हत्या हो जाती है और हम सच्चे शुभचिंतक से हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं सुनील राकेश का गहरा दोस्त था हर मुश्किल में उसके काम आता था । नर्म स्वभाव का इंसान था राकेश कभी गुस्से में सनील से कुछ कड़वी बात भी कह देता था तो वह इस पर अधिक ध्यान नहीं देता था राकेश ने इसे उसकी कमजोरी समझा वो वह और लोगों के सामने उसका अपमान करने लगा। एक बार राकेश अपने अधीन काम करने वाले मज़दूर की कामचोरी और लेटलतीफी से परेशान था वो उससे खुलकर कुछ नहीं कह सकता था ऐसे ही वो गुस्से से भरा बैठा था तभी सुनील वहाँ आ गया । उसने सुनील को मुहरा बनाया उसको सुनाते हुए उसने सुनील से कहा तुमसे बड़ा कामचोर निकम्मा नकारा मैंने आज तक नहीं देखा तुम ...

व्यंग्य : झूठी क़समें खाने वाले

जो लोग बार बार क़सम खाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं वे अक्सर झूठै और?धोखेबाज भी हो सकते हैं इसलिए कहा भी जाता है कि कसमें खाने वाले झूठे होते हैं कुछ लोग कहते हैं तुम्हारे सिर की कसम मैं झूठ थोड़ी कह रहा हूँ वे झूठ होते हैं ये लोग ख़ुद के सर की क़सम कभी नहीं खाते। बाज़ार में एक कपड़े की दुकान से नीरज ने जीनूस और?टी शर्ट का सौदा किया । दुकानदार ने उसकी कीमत ढाई हज़ार रुपये बताई नीरज ने कहा यह तो बहुत ज्यादा हैं कुछ कम करो इस पर दुकानदार ने पहले तो खूब कसमें खाईं फिर भाव ताव करते हुए इच्कीस सौ रुपये पर आ गया। बोला दो हज़ार रुपये में तो यह मुझे पड़ी है । फिर कसम खाकर बोला इतनी बड़ी दुकान लेकर बैठा हूँ क्या सौ रुपये भी नहीं कमाऊँ। नीरज जब जाने लगा तो दुकानदार बोला अच्छा बोलो कितना दोगे नीरज ने कहा बारह सौ रुपये से एक रुपया भी ज्यादा नहीं दूँगा उनमें काफी देर तक बहस हुई पर?नीरज टस से मस नहीं हुआ आखिर लुकानदार उसे बारह सौ रुपये में ही देने को तैयार हो गया। शीरज ने बारह सौ रुपये दिए वो उसने चुपचाप गिनकर रख लिए। नीरज ने जब उसको दोस्त को बताया कि ये दुकान से बारह सौ रौपये में लिए ...

व्यंग्य : आसमान से गिरे खजूर?में अटके।

जो लोग अनुचित रूप से धन कमाते हैं वे अभिमान में चूर होकर यह भी भूल जाते हैं कि कभी अगर वक्त ने पल्टी खाई तो उनका अंजाम क्या होगा वे तो यह मानकर चलते हैं कि वो सही हैं बाकी सभी गलत और?ऐसे ही वे सब पर भारी पड़ते रहेंगे और लोग उनसे इसी तरह दबकर रहते रहेंगे । लेकिन जब इनका समय विपरीत होता है तब इनकी हालत आसमान से गिरकर खजूर में लटके रहने वाले की तरह होती है। ऐसे लोगों को किसी की हमदर्दी भी नहीं मिलती क्योंकि इनके आसपास के लोग सभी इनसे तंग रहते हैं ऐसा कोई नहीं बचता जिनको इन्होंने परेशान न किया हो इसलिए जब इनके बुरे दिन आते हैं तो इनसे पीड़ित लोग बड़े खुश होते हैं । सोचते हैं इन्हें अपनी करनी का फल मिला भले ही देर से मिला हो। निखिल एक कमाऊ विभाग में सरकारी अधिकारी था उसके विभाग में धन बरसता था लोग वेतन से कई गुना ज्यादा रिश्वत से कमाते थे जिस से उनका परिवार विलासिता का जीवन जी रहा था वे रिश्वत के पैसे बड़ी बेरहमी से वसूलते किसी को फटेहाल देखकर भी उनका मन नहीं बदलता था जब तक रिश्वत के पैसे पूरे नहीं मिल जाते थे तब तक काम को अटकाए रहते थे। सुरेश की बेपी की शादी थी जिसमें खर्च के लि...

व्यंग्य : बेवज़्ह खिल्ली उड़ाने वाले

जिन के पास कोई काम नहीं होता या काम नहीं करना चाहते या जो जोखिम लेने से बचते हैं आराम तलब होते हैं वे काम करने वाले मेहनती की बिना कारण खिल्ली उड़ा कर अपने आप को सही ठहराते हैं तथा उसे मजाक का पात्र बनाकर ख़ुश होते रहते हैं। जबकि जिसे गरीबी के अभिशाप से मुक्ति पाने की चाह होती है वो सिर्फ अपने काम से मतलब रखता है। वो किसी ऐसे व्यक्ति की परवाह नहीं करता जो खुद लूजर होकर उसकी खिल्ली उड़ाता हो। कुछ लोग मेहनत से धन कमाते हैं । और ओवर टाइम करने से भी नहीं घबराते तथा फिजूल खर्ची से बचकर रहते हैं वे अपनी गरीबी के अभिशाप से जल्दी मुक्ति पा लेते हैं। चंद्रकाँत ने दिनभर काम किया था खाना खाचर शाम को वो चौराहे तक टहलने आया था वहाँ कुछ लोग ताश खेल?रहे थे ताश खेलते हुए उन्हें पूरा दिन हो गया था। चंद्र कांत थोड़ी देर के लिए वहाँ रुका तभी मोहन वहाँ आया वो बोला गन्ने की ट्राली भरना है चार लोगों की जरूरत है दो झंटे का काम है हर एक को पूरे चार सौ रुपये मिलेंगे। यह सुनकर ताश छेलने वालों में से कोई टस से मस तक नहीं हुआ किसी ने उसकी बात पर ध्यान तक नहीं दिया पर चंद्रकांत तैयार हो गया। हारकर दोनों...

व्यंग्य : अहसान भूलने वाले

जो अच्छे लोग होते हैं वो किसी का छोटा से छोटा अहसान भी नहीं भूलते तथा उस अहसान का बदला चुकाने का अवसर तलाशते रहते हैं और जब उन्हें मौका मिल जाता है तो फौरन उस अहसान का बदला चुका देते हैं तभी उनको चैन मिलता है। दूसरी ओर वे लोग भी हैं जो अपने ऊपर किया गया किसी का बड़े से बड़ा अहसान भी नकार देते हैं आजकल इनकी संख्या ज्यादा ही बढ़ती जा रही है। जब इनकी गरज होती है तब खूब चिकनी चिपड़ी बातें करते हैं ख़ुशामद में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहने देते ।और जब उनकी गरज निकल जाती है तो ऐसे मुँह फेर लेते हैं जैसे की जानते ही न हों कई लोगों का बहुत सा पैसा इनके फेर में पड़कर डूब गया है। माँगी लाल ने दस साल पहले रोशन लाल से पाँच लाख रुपये का कर्ज लिया था तब माँगीलाल अपना मकान बनवा रहा था जिसमें लागत का सत्तर प्रतिशत रुपया रोशन लाल द्वारा दिए गए कर्ज से प्राप्त हुआ था रोशनलाल ने अपने गाँव की जमीन बेची थी। उसके पैसे उनके पास थे। जो उन्होंने माँगीलाल की दयनीय दशा पर द्रवित होकर दे दिए थे उस समय?माँगीलाल ने सात लाख में पूरा मकान बनवा लिया था। जाज उस मकान की कीमत सत्तर लाख रूपये हो गई थी। उस समय सो...

व्यंग्य : ब्याज का चंगुल

ब्याज का चंगुल वो चंगुल है जिसमें फँसना तो आसान है पर उससे छूटना आसान नहीं होता लोग कर्ज लेकर बड़े खुश होते हैं जिसका लोन स्वीकृत हो जाए उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। उस समय वो इस पर तनिक भी विचार नहीं करता कि इसे अदा कैसे करेगा फिर नौबत यह आती है कि गिरवी रखी संपदा हाथ से निकल जाती है अशोक जी ने मकान बनवाते समय एक साहूकार से पाँच लाख रुपये का कर्ज लिया था उसकी ब्याज दर भारी थी मकान उन्होंने कुछ ज्यादा ही अच्छा बना लिया था जिसकी छोटी मोटी उधारी बहुत लोगों की बकाया थी। कर्ज देने वाले ने भी तकाजा नहीं किया पाँच साल बाद पूरे बत्तीस लाख रुपये की वसूली करने वो अशॅक के पास आया तीन प्रतिशन मासिक चक्रवर्ती ब्याज बढ़ते बढ़ते पूरे सत्ताइस लाख रुपये हो गया था। इतनी बड़ी राशि का सुनकर अशोक जी के होश गुम हो गए कर्ज देने वाला दबंग था अशोक के पसा और लोगों का कर्ज भी था। हारका उसे वो मकान बेचना पड़ा उस पैसे से अशोक जी ने कर्ज अदा किया। आजकल वे किराये के मकान में रह रहें। हैं कभी कभी वे सोचते हैं अगर उन्होंने बिना कर्ज लिए मकान बनाया होता वो भले ही छोटा तो तो आज ये नौबत नहीं आती...

व्यंग्य : कड़वा बोलने वाले

यह बात सही है कि कड़वा बोलने वाले बहुत कम लोकप्रिय होते हैं वे न किसी के चहेते होते हैं न ही कृपापात्र न कोई उन पर अहसान करता है न वे किसी का अहसान लेना पसंद करते हैं। बोलते कड़वा जरूर?हैं मगर बात पते की करते हैं जिसमें भलाई छिपी होती है इनके बोल बुरे जरूर लगते हैं मगर हितकारी होते हैं। दूसरी ओर मीठा बोलने वाले होते हैं हाँलाँकि मीठा बोलना अच्छा होता है मगर अधिक मिठास हमेशा अच्छी नहीं होती अगर मीठा बोलने वाला चापलूस और?मतलबी हो तो वो बहुत?बड़ा चालाक साबित होता है। मीठा बोल कर ये मुफ्त का चंदन घिसने में माहिर होते हैं जेब दूसरे की होती है और मज़े ये करते हैं ऐसे लोग किसी बड़े आदमी के दरबारी होते हैं जो उसके पैसे पर मौज करते हैं बदले में इन्हें बस जी हुज़ूरी करना होती है जो यह अच्छी तरह करना जानते हैं ।  सुरेश कड़वा बोलता था चाहे किसी को बुरा लगे या भला उसे पता चला कि दिनेश के दोस्त दुश्मन से मिलकर उसकी बुरी तरह पिटाई करने की योजना बना चुके हैं। दिनेश को उन्होंने रोक रखा है उससे बड़ी चिकनी चिपड़ी मीठी बातें कर रहे हैं उसकी खूब आव भगत की जा रही है मन पसंद नाश्ता कराया जा रहा है। ...

व्यंग्य : दुख में न कोय

सुख के दिनों में अपनापन जताकर लाभ उठाने वालों की अच्छी खासी संख्या रहती है। जिससे यह पता ही नहीं चलता कि इनमें कौन सही है और कौन गलत। कहते हैं सच्चे दोस्त की पहचान दुख में होती है दुख में जो हमारे साथ खड़ा हो तथा हमें पूरा सहयोग दे वही सच्चा दोस्त होता है पर ऐसे लोगों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है। जब कोई दुख से जूझता रहता है तब उसके साथ गिने चुने दोस्त ही होते हैं जो किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते न ही लाग लपेट की बातें करते हैं। जब व्यक्ति दुख से उबर जाता है । और जैसे ही उसके दिन बदलते हैं और सुख के साधन जुटने शुरू हो जाते हैं वैसे ही मतलबी और ख़ुदगर्ज लोग उस के करीब आना शुर्रू कर?देते हैं।तथा अपनेपन का वो अभिनय करते हैं कि सामने वाला पूरी तरह भ्रमित हो जाता है दुख के साथी न दिखावा करते हैं न लाग लपेट भरी बातें न उन्हें चापलूसी करना आता है इसलिए वे जल्दी ही दरकिनार कर दिए जाते हैं सुखी आदमी जब खुशामदियों को अपना चुका होता है इस लिए वो भी उन पर ध्यान नहीं देता सुख में उसे इसका बिल्कुल भी अंदाजा नहीं होता कि दुख में इनमें से कोई भी आसपास मँडराएगा तक नहीं। रामनरेश सरपंच का चुन...

व्यंग्य : ख़ुशी

आज के इस तनाव भरे जीवन में ख़ुशी बहुत दुर्लभ होती जा रही है लोग इतने तनाव में रहते हैं कि छोटी मोटी ख़ुशी उन पर कुछ असर नहीं डाल पाती है। बड़ी ख़ुशी भी वे ठीक से मना नहीं पाते हैं कोई उनकी ख़ुशी पर बधाई दे तो मुँह बनाकर बोलते हैं काहे की ख़ुशी कैसी ख़ुशी । फिर?बुरा मुँह बनाकर अपनी हज़ार परेशानियाँ गिनाने बैठ जाते हैं। और कुछ इस तरह से चित्रण करते हैं कि सुनने वाला जो बधाई देने आया था तब बड़ा ख़ुश मिजाज था अब गहरे दुख के सागर में डूबा दिखाई देने लगता है। ऐसे लोग हमेशा रोनी सूरत बनाए हुए मिलेंगे। कभी किसी ने उन्हें खुलकर हँसते हुए नहीं देखा होगा यह जब घर में आते हैं। तो इनकी त्यौरी चड़ी होती है कभी बच्चों पर झल्लाते हैं तो कभी पत्नी पर अपनी खीझ निकालते हैं इनके आते ही घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे घर में कर्फ्यू लगा हो। जब यह घर से जाते हैं तो पूरे घर का माहौल बदल जाता है। रस्तोगी साहब ने दो लाख में नई इलेक्ट्रिक स्कूटी ली थी। जिसमें डेढ़ लाख रुपये का लोन लिया था। उनके पास जो स्कूटी थी वो ठीक ठाक थी अच्छी चल रही थी मगर दिखावे के फेर मेअं उन्होंने यह इलेक्ट्रिक स्क...

व्यंग्य : जड़ खोदने वाले

कुछ लोग स्वभाव से बुरे होते हैं इनके मन में ज़रा भी सद्बाव नहीं होता । यह किसी की तरक्की देखकर जल भुन कर खाक हो जाते हैं यह किसी आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते ये पेड़ों में पानी सींचना अच्छा नहीं मानते इन्हें तो किसी जमे जकड़े पेड़ की जड़े खोदने में बहुत मजा आता है। किसी पेड़ को जड़ से उखाड़कर भी दम नहीं लेते बल्कि बाकी बची जड़ों में भी मठ्ठा डाल देते हैं ताकि वो फिर से हरिया न सके। इनके साथ रहने वालों की भी कमी नहीं है इन्हें विध्न संतोषी भी कहा जाता है। इनका ह्रदय परिवर्तन कोई नहीं कर सकता यह लोग जीवन पर्यंत तक भी अपना स्वभाव नहीं बदल पाते। मरते मरते भी ये किसी न किसी का बुरा करने में सफल हो ही जाते हैं। उमेश और महेश दोनों सगे भाई थे उमेश कुटिल स्वभाव का था महेश सीधे सरल स्वभाव का उमेश कामचोर भी  था जबकि महेश मेहनती होने के साथ बुद्धिमान भी था तथा व्यावहारिक भी। दोनों को जायदाद में बराबर का हिस्सा मिला था। दोंनों के हिस्से में दस दस एकड़ जमीन आई थी साथ ही एक एक मकान भी। लेकिन आठ साल में उमेश अपने कुटिल स्वभाव के कारण कंगाल हो गया था मारपीट चोरी और लूटमार के जुर्म...

व्यंग्य : सही नेतृत्व की तलाश

आमतौर पर साधारण आदमी राजनीती से दूरी बनाकर रखना पसंद करते हैं कुछ लोग आगे नहीं आना चाहते जब सही लोग नेतृत्व से बचते हैं तो उसका फायदा गलत लोग उठाते हैं इसका नतीजायह होता है कि आपराधिक वृत्ति के लोग राजनीति में कूद पड़ते हैं और चुनाव जीतकर समाज विरोधी कार्यों में लिप्त हो जाते हैं। कुछ कठपुतली टाइप के लोग कुछ अवसरवादी कुछ चापलूस राजनीति में आकर अराजकता फैलाते हैं सरकारी तंत्र?में अनुचित हस्तक्षेप करते हैं भ्रष्टाचार?में लिप्त होकर अनाप शनाप धन कमाते हैं। और आम आदमी के हक़ पर डाका डालते हैं झूठे वादे करते हैं झूठे आश्वासन देते हैं। किसी भी तरह से चुनाव जीतने में विश्वास करते हैं इनमें नैतिकता नाम को भी नहीं होती है। देश में अच्छे नेताओं की कमी है। जो हैं उनके दम पर हमारा देश इतनी तरक्की कर सका है। महतपुर गाँव आसपास के पचास गाँवों में सबसे उन्नत गाँव था गाँव में शराब की दुकान नहीं थी ग्राम स्तर के सभी सरकारी कार्यालय गाँव में थे कोई गाँव में गाली गलौज नहीं करता गाँव में कभी कोई अपराध नहीं होता था इसका श्रेय ओंकार बाजी को जाता है वो पच्चीस साल तक गाँव के सरपंच रहै। उनके कार्यकाल में ...

व्यंग्य : बेईमानी

जो ईमानदार होते हैं वे अनुचित तरीके से धन नहीं कमाते उनकी कमाई गाढ़ी होती है भले ही थोड़ी हो यह लोग फिजूल खर्ची नहीं करते किफायत से खर्च करते हैं और ख़ुश रहते हैं इनको अपने धन का अभिमान नही होता न ही ये अनाप शनाप खर्च कर किसी पर रौब जमाते हैं। ठीक इसके विपरीत बेईमानी से धन कमाने वाले होते हैं झूठ से छल कपट छिद्र से किसी की मज़बूरी का अनुचित लाभ उठाकर धन कमाते हैं। अपने पट का दुरूपयोग करते हैं फिर उस धन को अनाप शनाप तरीके से खर्च करते हैं।अहंकार इनमें कूट कूट कर भरा रहता पद के नशे में चूर होते हैं और किसी का भी अपमान कर बैठते हैं। नितिन एक कमाऊ विभाग में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत था। बिना रिश्वत लिए किसी का कोई काम नहीं करता था। बड़ी बेरहमी से रिश्वत के पैसे वसंल करता था वेतन से कई गुना अधिक उसकी रिश्वत की कमाई थी। गरीब फटेहाल लोगों से भी वो रिश्वत वसूल कर लेता था उसमें इन्सानियत नाम की चीज नहीं थी न जाने कितने गरीब बेबस असहाय मज़बूरी के मारे लोगों की हाय उसे लगी हुई थी। लेकिन समय सदा एक सा नहीं होता वक्त ने पल्टी खाई । लोकायुक्त द्वारा रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ाया घर में छापा पड़ा सब...

व्यंग्य : अड़गेबाज

कहते हैं कि बुरे काम होने में देर नहीं लगती पर अच्छा करने जाओ तो हज़ार रुकावटें सामने आते हैं नित?नई परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं ।मन भी डगमगा जाता है। हतोत्साहित करने वाले भी बहुत?मिल जाते हैं। इनसे सबसे ज्यादा बुरे वे लोग होते हैं जो अड़ंगा लगाते हैं किसी के बने हुए काम बिगाड़ने में इन्हें अपार सुख की प्राप्ति होती है। इनके सामने कोई अपनी परेशानी बताए तो इन्हें अच्छा लगता है और कोई इनसे अपनी खुशखबरी शेयर करे तो इनके तन बदन में आग लग जाती है इन्हें कीसो की ख़ुशी अच्छी नहीं लगती। राधेश्याम जी किराये के मकान में रहते थे ऐसे रहते हुए इन्हें दस साल हो गए थे। राधेश्याम जी ने एक आवासीय भूखण्ड देखा था जो बिकाऊ था। उसकी कीमत पन्द्रह लाख रुपये थी। उन्होंने दस लाख रुपये की व्यवस्था तो कर ली थी लेकिन पाँच लाख रुपये कम पड़ रहे थे। वे इसी उधेड़बुन में थे चि कहीं से पाँच लाख रुपये का बंदोबस्त कैसे हो। उन्होंने एक से बात की थी वो डेढ़ परसेन्प मासिक ब्याज दर पर पैसे देने को तैयार हो गया था। भूखण्ड का सौदा शीघ्र होने वाला था। तभी उनसे एक चूक हो गई उनके परिचित चतुर सिंह से जब उनकी बात हुई तो चतरसिं...

व्यंग्य : अपनों का दिया दंश

अपने वाले अगर अच्छे न हों हों तो उनसे अधिक दुख देने वाला कोई ओर नहीं होता अपनों का दिया दंश बहुत?पीड़ा जनक होता है खासकर अपने करीबी रिश्तेदार हों। अब तो यह भी देखा जा रहा है कि पति पत्नी के बीच अगर प्रेम खत्म हो गया हो तो वो एक दूसरे का सताने के अवसर तलाशते रहते हैं।  कई परिवारों में कोई बेटा माँ बाप का ज्यादा चहेता होता है और कोई उपेक्षित जो चहेता होता है वो उपेक्षित को परेशान करता है। और माता पिता भी इसे नजर?अंदाज कर?जाते हैं चहेता अगर उपेक्षित की झूठी शिकायत भी कर दे तो उसे सही मान लिया जाता है । और उपेक्षित को बिना किसी कसूर के कड़ी सजा मिल जाती है जिसे देखकर चहेते को पैशाचिक आनंद की अनुभूति होती है। दूसरी ओर यदि उपेक्षित चहेते की सही शिकायत भी कर दे तो उसे झूठी मानकर?उसे ही प्रताड़ित किया जाता है। इनसा दुखी और कोई नहीं होता क्योंकि ये अपनों के अत्याचार कै शिकार होते हैं। ये अगर घंटों आँसू भी बहाएँ तब भी इनके सगे अपनों का ह्रदय नहीं पसीजता। जबकि चहेता अगर जरा भी उदास हो तो पूरा घर दुखी हो जाता हैं और?उसको खुश करने का प्रयास करता है अगर वो इसका कारण उपेक्षित के द्वारा...

व्यंग्य : जली हुई रस्सी के बल

एक कहावत है कि रस्सी जल गई फिर भी उसके बल नहीं गए। । रस्सी तो राख में बदल गई औसे भले ही मसलकर धूल की तरह कर दें तो बल का नामोनिशा॔ ही न रहे। इसी तरह से कुछ लोग ऐसे होते हैं । जो किसी ताकतवर से जब लड़ते हैं तो अपनी कमजोरी पर ध्यान नहीं देते और उसको कमजोर समझने की भूल कर लड़ाई छेड़ देते हैं बार बार मात खाते हैं और फिर खड़े हो जाते सैं बलवान उसे पटखनी पर पटखनी देता है और वो उठकर फिर लड़ना शूरू कर देते हैं। यह लड़ाई जब तक लड़ते रहते तब तक पूरी तरह बेदम न हो जाएँ। और इन्हें हराने वाला इनको पूरी तरह मिटा चुका होता है। इनमें समझदारी बिल्कुल नहीं होती लड़ाई करने की पहल इनकी और से ही होती है। और बुरी तरह हारते भी ये ही हैं। एक मोहल्ले की बात है उसमें तरूण नाम का पहलवान था निहायत ही शरीफ पर लड़ने में सबसे तेज उसके सीधेपन को सरलता को एक दुबला पतला कमजोर सा इंसान जिसका नाम जीवन था कमजोरी समझ बैठा और उसे लड़ाई के लिए उकसाने लगा तरुण ने कई बार उसकी चुनौती को नजर अंदाज किया। इससे उसकी हिम्मत बढ़ती चली गई। आखिर एक दिन तरुण उसकी चुनौती स्वकार कर ली इसके बाद तरुण ने उसकी वो धुनाई कि कई महीनों...

व्यंग्य : गुड़ी गाँठ

जो सहज सरल स्वभाव के धनी होते हैं वे अपने मन को हमेशा साफ रखते हैं दुश्मन के प्रति भी उनके मन में कोई बुरा भाव नहीं होता। पर जो कुटिल होते हैं वे ज़रा सी बात पर भी गुड़ी गाँठ पाल कर अपने मन में रख लेते हैं और जब तक अपनी पूरी कसर नहीं निकाल लेते तब तक इन्हें जरा सा भी चैन नहीं मिलता यह दस गुना बदला निकाले बिना नहीं मानते।जो लोग ऐसे लोगों की फितरत को जान लेते हैं वे इनसे बहुत सँभलकर रहते हैं। फिर भी जाने अनजाने में अगर कोई चूक हो जाए और वो इनके दिल पर लग जाए तो समझो सामने वाले की खैर नहीं । इसके लिए ये किसी भी हद तक गुज़रने में जरा सी भी देर नहीं करते। ऐसे ही एक स्वनामधन्य कवि थे अनाम जी एक कवि गोष्ठी में एक युवा कवि ने कुछ ऐसी टिप्पणी कर दी जो उन्होंने अपने ऊपर ले ली जबकि उस कवि की ऐसी मंशा भी नहीं थी । जब अनाम जी की बारी आई तो वे फट पड़े उस कवि की कविता को उन्होंने घटिया स्तरहीन निरूपित कर दिया उस कवि के खिलाफ अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया वे कवि बुरी तरह आहत थे अपमान का कड़वा घूँट पी रहे थे ।कार्यक्रम के बाद जब युवा कवि ने उनसे माफी माँगी तब भी वे उस पर उबल गए लाल पीली आँखें...

व्यंग्य : भावनाओं का लाभ उठाने वाल

भावना भावुक मन की पहचान होती हैं जो भावुक होते हैं वे दिल के भी नर्म होते हैं ऐसे लोग दिल से चलते हैं दिमाग का उपयोग कम करते हैं ज्यादातर भावुक लोग भले और नेक इंसान होते हैं। इनकी नर्मदिली से लोग लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं ये लोग भावुक इंसान के सामने अपने आपकी सबसे दुखी बताकर घड़ियाली आँसू बहाकर इनके दिल को पिघलाने में सफल हो जाकी और शराफत का फायदा चतुर चालाक तथा मतलबी उठा लेते हैं । यह भावुक इंसान इस तरह की ठगी के अक्सर शिकार होते हैं। फिर भी इनकी भावुकता कम नहीं होती न ही इनका दिल कभी कठोर होता है। रमेश इसी तरह के भले इंसान थे एक बार वे अपने पूरे माह का वेतन किसी बेटी की शादी के लिए दान कर के आ गए थे और यह भी कह आए थे ये बेटी की शादी के लिए हैं इसे लौटाने की जरूरत नहीं है। उनकी पत्नी सरला को जब यह बात पता लगी तब सिर पकड़कर बैठ गई सरला जानती थी उनकी भावुकता का फायदा उठाया गया है लड़की वाला कोई गरीब फटेहाल नहीं है बल्कि हद दर्जे का चालाक इंसान हैं । उसने रमेश के बड़े भाई राकेश को फोन कर के यह बात बताई राकेश भी उस आदमी की फितरत को अच्छी तरह जानते थे वे अपने कुछ साथियों क...

व्यंग्य : अकेलेपन से त्रस्त

संयुक्त परिवार टूटने के बाद अनेक विसंगतियाँ साहने आई हैं जिसमें अकेलेपन से त्रस्त बहुत से सीनियर?सिटीजन मिल जाएँगे उनका हालचाल पूछने वाला कोई नहीं है। वे ऐसे पाश इलाके में आलीशान भवन में रह रहे हैं जहाँ कोई किसी से वास्ता तक नहीं रखता। लोग पड़ोस में रहते हुए भी एक दूसरे को जानते तक नहीं हैं। इनमें ऐसे वरिष्ठ नागरिक भी मिलेंगे जिन्होंने अपने जीवन की शुरूआत गरीबी में की थी लेकिन बाद में खूब मेहनत करके उच्च शिक्षा प्राप्त कर के बड़े अधिकारी बन गए बच्चे पढ़लिखकर विदेश में बस गए पत्नी की मृत्यु हो गई अब वह अकेले रह गए हैं। पाश कॉलोनी में मकान लेना उनके लिए अभिशाप सिद्ध हो गया है । पैसा तो है पर सुख चैन नहीं है अकेलेपन से बड़ा कोई दुख नहीं जिसके ऐसे लोग शिकार हो गए हैं। अशोक जी अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए थे। उनका लड़का अभिषेक विदेश में रह रहा था वो पिता का मकान बेचकर विदेश में घर खरीदना चाहता था पिता को उसने वृद्धाश्रम में में भेजने का निर्णय ले लिया था। वो बार बार उनसे मकान बेचने का दवाब बना रहा था। उसी दौरान अशोक जी के ऑफिस के बगल में चाय की दुकान लगाने वाला घीसीलाल मिला उसकी दुक...

व्यंग्य : भूतपूर्व होने का दुख

कहते हैं कि संसार में दुख तो बहुत है पर सबसे बड़ा दुख भूतपूर्व होने का है। जिसमें व्यक्ति की मान प्रतिष्ठा रुतबा पद के छिनते ही मिट्टी में मिल जाता है जो झुकझुकक सलाम करते थे वे देखते ही मुँह मोड़ लेते हैं जो चाय मुफ्त में पीने को मिल जाती थी वो अब पैसे देने के बाद भी बेस्वाद मिलती है। कोई उधारी में सामान नहीं देता जो झुक कर बात करते थे वे आँखें तरेरते हैं। हाकिम सिंह जब ग्राम के सरपंच थे तब सत्ताधारी दल के जिला संगठन मंत्री भी थे। उनका बड़ा रुतबा था उनके यहाँ हाजिरी लगाने अच्छे लोग आते थे । सब उनकी कृपा के आकांक्षी रहते थे। जिससे जो कह दिया सो कह दिया बस वाला उनसे कभी किराया नहीं लेता था। जबसे चुनाव हारे और प्रदेश में भी उनकी पार्टी हार गई तब से उनके बुरे दिन शुरू हो गए अब तक तो हवा में उड़ रहे थे चुनाव हारते ही जमीन पर गिरकर चारों खाने चित हो गए थे अब उनकी न तो कोई पूछ परख रह गई थी न सुनवाई हो रही थी। उनसे एक गलती हो गई वे अपने एक समर्थक को छुड़ाने थाने पहुँच गए। उनका मानना था कि प्रभारी महोदय उनके अच्छे परिचित हैं । मगर हुआ उल्टा उन्हें ही हवालात में बंद कर दिया पुलिस ने फिर अप...

व्यंग्य : तानाशाह

जो हद दर्जे के अहंकारी अपने आपको सबसे अक्लमंद बाकी सभी को मूर्ख समझने वाले होते हैं वे तानशाह से कम नहीं होते इनके साथ जो रहते हैं वो प्रायः इनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले होते हैं चाहे उसमें सामने वाले का कितना ही नुक्सान क्यों न हो।  जिनका रवैया तानाशाही होता है वो कितना ही नुक्सान उठा लें पर अपनी गलती मानने को तैयार ही नहीं होते । उन्में से कुछ लोग होते हैं जो किसी को बोलने का मौका ही नहीं देते बस अपनी सुनाए जाते हैं फिर अंतिम निर्णय भी दे देते हैं कोई तर्क अथवा बहस की कोई गुंजाइश नहीं रखते। इस तरह के लोगों में निशा भी शामिल थी । एक बार क्या हुआ कि वो अपने सगे संबंधियों के साथ किसी तीर्थ यात्रा पर गए वहाँ भी निशा ने किसी की नहीं चलने दी। किसी ने कुछ कहने की कोशिश भी की तो उसे बेइज्जत होना पड़ा। उसके पति अनिल की तो उसने सबके सामने बड़ी बेइज्जती की अनिल को किसी ने बताया था कि यहाँ एक सेवा संस्थान द्वारा मात्र दस रुपये भें भरपेट गरमागरम भोजन मिलता है जिसमें मिष्ठान्न भी शामिल होता है उससे अच्छा भोजन आठ सौ रुपये की रेस्टोरेन्ट की थाली में भी नहीं मिलता। काउण्टर खुला हुआ था कूप...

व्यंग्य : समरथ को नहीं दोष गुसाईँ

हमारे समाज की संरचना शायद कुछ ऐसी है जिसमें समर्थ को कोई दोषी नहीं ठहराता उसके अवगुणों को भी गुण मान लिया जाता है उसकी बड़ी गलतियाँ भी लोग नज़र अंदाज कर देते हैं। जबकि कमज़ोर की छोटी गलती को बढ़ा चढ़ाकर बडी बताई जाती है और उसे कड़ी सजा दे दी जाती है उसकी कहीं कोई सुनवाई भी नहीं होती। कभी कभी ऐसा भी होता है कि कोई समर्थ जब गलती करता है तो उसका बदला छोटों से निकाला जाता है। उसे जबरन दोषी ठहराकर उसे इसकी कड़ी सजा दे दी जाती है। छोटे लाल जमींदार के यहाँ हाली का काम करता था खेत में बनाए मालिक के दिए मकान में रहता था । एक दिन उसका नौ वर्ष का लड़का सतीश रोते हुए आया और बोला एक लड़के ने जब में खेल?रहा था तब मुझे अकारण आकर मारा और बहुत मारा कह रहा था कि तेरे बाप में भी इतनी हिम्मत नहीं है जो मेरा कुछ बिगाड़ सके। सुनकर छोटेलाल को बहुत गुस्सा आया उसने बाँस की पतली छड़ी उठाई ओर उस लड़के के पास आया। लेकिन लड़के को देखते ही उसके हाथ पैर ढीले पड़ गई हाथ की छड़ी छूट गई। बड़े अदब से बोला छोटे मालिक आप । वो लड़का छोटेलाल के मालिक का बेटा था शहर में रहता था नंब एक का घमंडी गरीबों से नफ़रत करने ...

व्यंग्य : संबंधों का निर्वाह

कहते हैं कि अगर अच्छे रिश्तेदार से ज्यादा कोई सुख प्रदान नहीं कर सकता । तो वहीं बुरे रिश्तेदारों से अधिक दुखदायी कोई भी नहीं हो सकता। इन रिश्तों में अपने खून के रिश्ते भी शामिल होते हैं। सबसे निकट का रिश्ता पति पत्नी का माना जाता है पर उनमें भी अगर अहं की लड़ाई हो या किसी एक का स्वभाव खराब हो तो दूसरे की ज़िंदगी नर्क से भी अधिक बदतर हो जाती है एक रिश्ता जीजा साले का भी होता है जिसमें सबसे ज्यादा विवादास्पद रिश्ता साले का समझा जाता है तभी तो किसी को साला कहना गाली समझी जाती है। अगर किसी की तरक्की देखकर सबसे अधिक जलने वालों की सूची बनाई जाए तो उसमें अधिकांश रिश्तेदार ही शामिल होते हुए नज़र आएँगे। हाँलाकि इसमें मतभेद हो सकते हैं पर ज्यादातर लोगों का यही कहना होता है। अनिल ने एक आवासीय भूखण्ड का सौदा किया था पास में ही उसके साले दीपक का भी मकान था। अनिल से इतनी गलती हो गई कि उसने भूखण्ड की रजिस्ट्री होने के पहले यह बात अपने साले को बता दी। साले ने ऊपरी तौर पर तो ख़ुशी जताई पर भीतर ही भीतर?जल भुनकर खाक हो गया। उसने भूखण्ड के मालिक से मिलकर उसे इतना भड़काया कि उसने भूखण्ड बेचने से ...

व्यंग्य : सरकारी नौकरी वाला दूलूहा

वैसे तो सरकारी नौकरी मिलना आसान नहीं है । पर जिनकी सरकारी नौकरी लग जाती हैं उनके यहाँ विवाह योग्य लड़कियों के माता पिता की भीड़ लगना शुरू हो जाती है उसी हिसाब से दहेज भी निर्धारित हो जाता है। ऐसे दूल्हे के पिता को अपने बेटे के लिए दुल्हन की तलाश नहीं करना पड़ती । ऐसे दूल्हों की संख्या बहुत कम होती है तथा विवाह योग्य लड़कियों की संख्या कई गुना अधिक ऐसे में जो सबसे अधिक रुपया देता है वो अपनी बेटी की शादी ऐसे दूल्हे से करने में सफल हो जाता है बाकी सब मायूस हो जाते हैं। जिस तरह सरकारी नौकरी करने वाले लड़कों की पूछ होती है उसी तरह सरकारी नौकरी करने वाली लड़की के पिता के दिमाग भी सातवे आसमान पर होते हैं ऐसी लड़की से विवाह करने वाले लड़कों की संख्या कम नहीं होती वर पक्ष द्वारा इनको दहेज रहित शादी के ऑफर दिए जाते हैं ऐसी लड़की के नैन नक्श पर भी ध्यान नहीं दिया जाता सरकारी नौकरी की विशेषता ही ऐसी है जिसके सामने बाकी सब कुछ गौण हो जाता है। विशाल एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था साठ हजार?रुपये वेतन मिल रहा था उसकी शादी अंजलि से लगभग तय हो गई थी लेकिन जब अंजलि को सरकारी नौकरी करने वा...

व्यंग्य : सफलता की चमक

सफलत की चमक लोगों को भले ही चकाचौंध कर दे पर जिसको सफलता भिलती है उससे पूछो इसके लिए उसने कितने प्रयास किए हैं। सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता यह कठोर?परिश्रम लग्न से प्राप्त होती है जो सफल होता है वो सोने की तरह खरा होता है। हीरा कितना ही कठोर क्यों न हो उसे भी अगर तराशा न जाए तो वह भी अपनी पूरी चमक नहीं बिखरा सकता। । पारखी कहते हैं कि सोने में प्राकृतिक रूप से कोई खोट नहीं होती यही उसकी विशेषता होती है और यही उसकी चमक का सबसे बड़ा कारण जो किसी भी हाल में फीकी नहीं होती ना ही सोने में कभी जंग लगती है। सोने में खोट अगर मिला भी दी जाए तो उसे इतना तपाया जाता है कि खोट सारी जलकर राख हो जातो है पर सोने में और अधिक निखार आ जाता है। शेखर जब कलेक्टर बनकर जिला मुख्यालय पर आए कार्यभार ग्रहण करने के बाद जब उन्होंने स्टॉफ के सदस्यों से परिचय प्राप्त किया तो अपने सहपाठी सुधीर को देखकर चौंक गए। सुधीर ने स्नातक परीक्षा में बहत्तर प्रतिशत?अंक प्राप्त कैए थे जबकि उनके अठ्ठावन प्रतिशत अंक आए थे उसका सबसे बड़ा कारण था कि सुधीर के चाचा यूनिवर्सिटी में सेवारत थे उनके कारण षुधीर के इतने अं...

व्यंग्य : बदला

जिस तरह दिवाली पर कुछ लोग जुआ खेलते हैं कि जो कि एक बुराई हे। उसमें जो बड़ी रकम हार जाते हैं उसकी क्षतिपूर्ती करने में उन्हें पूरा साल लग जाता है उसी तरह होली पर लोगो को दुश्मनी निकालने का मौका मिल जाता है होली की आड़ में वे अपने दुश्मन की तबियत से पिटाई करके अपना बदला निकाल लेते हैं । तभी तो यह कहावत चल गई कि दिवाली का लुटा और होली के पिटे के ठीक होने में पूरा साल लग जाता है। कुछ लोगों बदला निकालने की भावना बहुत तीव्र होते हैं जब तक यह अपना बदला नहीं निकाल लें ते तब तक उन्हें चैन नहीं पड़ता सुरेश को कक्षा में शिक्षक की मार?खाना पड़ी वहीं राकेश खड़ा था । सुरेश ने यह मान लिया कि राकेश के कारण उसकी पिटाई हुई। उसके मन में बदला लेने की भावना तीव्र हो गई । उसने छल कपट से राकेश को अपने साथ ले लिया अपने चार दोस्तों को भी इशारा कर दिया फिर किसी खँडहर में?सुन सान जगह उसके और उसके दोस्तों ने मिलकर राकेश की खूब पिटाई कर दी तब कहीं उसके मन को चैन मिला। कई लोग ऐसे होते हैं जो बात तो भले की करते हैं पर वो होती है बहुत कड़वी। जो कुछ लोगों को बुरी लगती है और वो उसका बदला भी निकालते हैं चाहे उ...

व्यंग्य : हाँ में हाँ मिलाने वाले

जो मतलबी इंसान होते हैं वे सिर्फ अपने मतलब से वास्ता रखते हैं ।इसलिए वे हाँ में हाँ मिलाना बुरा नही॔ समझते और झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं जिससे सामने वाले को अपनी गलतियाँ भी सही लगने लगती हैं जो उससे गहरे नुक्सान में धकेल देती हैं। फिर भी यह उसके चहेते बने रहते सैं जैसे कुछ लोगों की ख़ुशामद करने की आदत होती है वेसे ही कुछ लोग अपनी खुशामद से खुश होते हैं और?अपने आपको श्रेष्ठ और सही मानने का भ्रम पाल लेते हैं। यह चापलूसी करने वाले आपको हर क्षेत् में मिल जाएँगे सरकारी दफ्तर में बड़े साहब की चापलूसी करने वाला सबसे ख़ास होता है क्योंकि बड़े साहब उसकी हर बात मानते हैं। जो खरीऔर कड़वी बात करता है वो किसी को अच्छा नहीं लगता। एक ऑफिस में एक हितग्राही से बड़े साहब की तीखी तकरार हो गई थी बड़े साहब ने भी कसम खा ली थी चाहे कुछ भी हो जाए इसका काम नहीं करूँगा । उनके इस इरादे को मज़बूती दी उनके चापलूस राकेश ने वो ऑफिस के चक्कर लगा लगा कर थक गया लेकिन उसका काम नहीं हुआ। खैर वक्त ने करवट बदली कोई उसे कलेक्टर साहब के पास ले गया उसकी बात सुनकर साहब पसीज गए उन्होने संबंधित अधिकारी के खिलाफ जाँ...

व्यंग्य : बुझे दीपक

जब रात गहरी अंधेरी होती है तब दीपक सबसे महत्वपूर्ण हो जाते हैं उजाले के लिए उनको जलाया जाता है तेज हवा से बुझने से बचाने के लिए कई प्रकार के उपाय करना पड़ते हैं। उनका विशेष ख्याल रखा जाता है । वही दीपक सुब्ह होने पर बुझाकर किसी कोने में रख दिए जाते हैं फिर पूरे दिन उनकी कोई खोज खबर नहीं ली जाती यही बात इंसानों पर भी लागू होती है। जब कोई आदमी जवान होता है मजबूत होता है ख़ूब पैसा कमाता है पूरे परिवार का खर्च चलाता है तब उसकी बड़ी पूछ परख होती है तब उजाला देते हुए दीपक के समान होता है। वही आदमी बूढ़ा हो जाता है कमाने योग्य नहीं रहता पुत्रों पर आश्रित हो जाता है तब उसकी दशा बुझे हुए दीपक के समान हो जाती है उपेक्षा का शिकार हो जाता है। यह बुझे हुए दीपक जैसे लोग जब आपस में बातचीत करते हैं तब अपने पुराने सुहाने समय में खो जाते हैं जिससे वो कभी उबरना नहीं चाहते इनकी बातों पर बाकी लोग ध्यान नहीं देते किसी के पास इनकी बातों को सुनने की फुरसत नही होती। यही हाल काका धनीराम का था। वे भी बुझे हुए दीपक की तरह हो गए थे। दो लड़के थे जिन्होंने उनकी दोनों दुकानों पर?अधिकार कर लिया था वे खर्च...