सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : भावनाओं का लाभ उठाने वाल

भावना भावुक मन की पहचान होती हैं जो भावुक होते हैं वे दिल के भी नर्म होते हैं ऐसे लोग दिल से चलते हैं दिमाग का उपयोग कम करते हैं ज्यादातर भावुक लोग भले और नेक इंसान होते हैं।
इनकी नर्मदिली से लोग लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं ये लोग भावुक इंसान के सामने अपने आपकी सबसे दुखी बताकर घड़ियाली आँसू बहाकर इनके दिल को पिघलाने में सफल हो जाकी और शराफत का फायदा चतुर चालाक तथा मतलबी उठा लेते हैं । यह भावुक इंसान इस तरह की ठगी के अक्सर शिकार होते हैं। फिर भी इनकी भावुकता कम नहीं होती न ही इनका दिल कभी कठोर होता है। रमेश इसी तरह के भले इंसान थे एक बार वे अपने पूरे माह का वेतन किसी बेटी की शादी के लिए दान कर के आ गए थे और यह भी कह आए थे ये बेटी की शादी के लिए हैं इसे लौटाने की जरूरत नहीं है। उनकी पत्नी सरला को जब यह बात पता लगी तब सिर पकड़कर बैठ गई सरला जानती थी उनकी भावुकता का फायदा उठाया गया है लड़की वाला कोई गरीब फटेहाल नहीं है बल्कि हद दर्जे का चालाक इंसान हैं । उसने रमेश के बड़े भाई राकेश को फोन कर के यह बात बताई राकेश भी उस आदमी की फितरत को अच्छी तरह जानते थे वे अपने कुछ साथियों के साथ आए उसे जब उन्होंने अपने तरीके से समझाया तब वो आधे पैसे लौटाने पर तैयार हुआ वो महीना सरला ने बड़ी तंगी में बिताया इसके बाद जब उन्हें पूरी तनख्वाह मिली तब कहीं उनकी आर्थिक तंगी दूर हो सकी। । जबकि कुछ चालाक टाइप के लोग दूसरों की जेब ढीली कराकर मजे लूटने में कुशल होते हैं। ऐसे लोग अपनी जेब से धेला भर भी खर्च नहीं करते पर बात बनाने में बड़े माहिर होते हैं।
*****


रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

कहानी: मिर्च का भाव

महानगर के न्यू मार्केद के एक हिस्से पर गाँव से आए कुछ किसानों की एक दर्जन सब्जी फल फूल की दुकाने थीं उनमें जो सबसे बड़ी दुकान थी वो किशनलाल पटेल की थी सभी किसान बमूलिया गाँ के थे जो महानगर से पच्चीस किलोमीटर दूर था पिछले पाँच सालों से वे ये दुकान लगा रहे थे और सभी खूब संपन्न थे वे सब अपने खुद के खेत में उपजी सब्जी फल फूल बेचते थे । इसमें बिचौलियों की कोई भूमिका नहीं थी सब्जी सीधे उत्पादक द्वारा ग्राहकों तक प हुँचती उचित भाव से ताजी सब्जी लेकर ग्राहक भी बहुत खुश होते थे यही कारण था कि सुब्ह शाम न्यू मार्केट के उस सब्जी फल वाले कार्नर पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी रात के आठ बजे तक पूरी सब्जी बिक जाती थी आज भी किशनलाल सब्जी बेचकर बमूलिया आए थे रात के नौ बजने वाले थे सब्जी उत्पादक के साथ ही फुटकर विक्रेता बनने से आज वे करोड़पति किसान बन गए थे उनका घर गाँव में सबसे आलीशान था। किशन लाल आज जो बिक्री हुई थी उसका हिसा जोड़ रहे थे पूरे डेढ लाख रुपये की सब्जी बिकी थी उन्होने हिसाब लगाया यदि यही सब्जी वे दलालों को देकर आते तो इस के मुश्किल से तीस हज़ार रुपये ही मिलते जिसमें प हजार र...

व्यंग्य: मतलबी अपने वाले

पुराने नैतिक मूल्यों के क्षरण के इस दौर ऐसे मतलबी लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जो बिना मतलब के किसी से किसी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं रखते। जिससे इनका मतलब होता है उसका थूक तक झेलने को तत्पर हो जाते हैं यह फिर पक्के सेवा भावी बन जाते हैं इनका सेवाभाव देखने लायक होता है ।सामने वाला इनको चाहे जुतियाए चाहे गरियाए चाहे इनकी लाख बेइज्जती कर दे पर इनके चेहरे की मुस्कुराहट में परिवर्तन नही होता ।यह सब मतलब रहने तक सीभित रहता है ।मतलब निकल जाने पर यह लोग फिर उस तरफ मुड़कर भी नसीं देखते ये लोग पक्के अहसान फरामोश होते हैं ये चापलूस लोग योग्य लोगों के हकों पर डाका डालने में जरा भी संकोच नहीं करते। जब यह बात हम अपने मित्र दिनेश से कर रहे थे तब करन खेड़ा गाँव के सरपंच हमारी बात बड़े गौर से सुन रहे थे वे हमारे पास आए और बोले आप बिल्कुल सही कह रहे हो ऐसे एक मतलबी अपने वाले से मैंने मुश्किल से पीछा छुड़ाया है उसने मेरी छवि का बहुत नाजायज फायदा उठाया यह सुनकर?हमारी जिज्ञासा बढी तब उन्होंने विस्तार से बताया हमारा सगा साला है बाबूलाल जो आजकल जेल की हवा खा रहा है । तीन साल पहले वो ह...