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व्यंग्य : संबंधों की बेकद्री

दूसरों को ख़ुश करने के लिए कभी कभी कुछ लोग अपनों की बेकद्री कर देते हैं जो बाद में उनको बड़ी भारी पड़ती है। जो हमारा शुभचिंतक होता है वो हमें चाहता है इसलिए वो हमारी कड़वी बात भी हँसकर सहन कर लेता है और इसका फायदा उठाकर लोग उसकी बेकद्री करना शुरू कर देते हैं।
लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि हर चीज की हद होती है जैसे ही हद पार होजाती है और पानी सर से गुज़र?जाता है। सबंधों की उसी वक्त हत्या हो जाती है और हम सच्चे शुभचिंतक से हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं सुनील राकेश का गहरा दोस्त था हर मुश्किल में उसके काम आता था । नर्म स्वभाव का इंसान था राकेश कभी गुस्से में सनील से कुछ कड़वी बात भी कह देता था तो वह इस पर अधिक ध्यान नहीं देता था राकेश ने इसे उसकी कमजोरी समझा वो वह और लोगों के सामने उसका अपमान करने लगा। एक बार राकेश अपने अधीन काम करने वाले मज़दूर की कामचोरी और लेटलतीफी से परेशान था वो उससे खुलकर कुछ नहीं कह सकता था ऐसे ही वो गुस्से से भरा बैठा था तभी सुनील वहाँ आ गया । उसने सुनील को मुहरा बनाया उसको सुनाते हुए उसने सुनील से कहा तुमसे बड़ा कामचोर निकम्मा नकारा मैंने आज तक नहीं देखा तुम से परेशान हो गया हूँ इसके अलावा उसने उस मजदूर की सारी भड़ास सुनील पर निकाल दी । इससे सुनील बहुत आहत हुआ वो बिना कुछ कहे वहाँ से चला गया राकेश ने संबंधों की नींव हिला दी थी । सुनील ने इसके बाद फिर कभी राकेश से कोई वास्ता नहीं रखा कुछ दिन तो राकेश ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब उसे सुनील की अहमियत का अहसास हुआ तब उसने सुनील से बात तो की पर उसी कड़वे लहजे में उसके इस व्यवहार ने रहा सहा संबंध पूरी तरह से ही खत्म कर दिया। राकेश के पास सिवाय पछतावे के अब ओर कुछ नहीं बचा था। वो अपना सबसे अच्छा दोस्त खो चुका था और इससे बुरी बात क्या हो सकती थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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