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व्यंग्य : झूठी क़समें खाने वाले

जो लोग बार बार क़सम खाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं वे अक्सर झूठै और?धोखेबाज भी हो सकते हैं इसलिए कहा भी जाता है कि कसमें खाने वाले झूठे होते हैं कुछ लोग कहते हैं तुम्हारे सिर की कसम मैं झूठ थोड़ी कह रहा हूँ वे झूठ होते हैं ये लोग ख़ुद के सर की क़सम कभी नहीं खाते।
बाज़ार में एक कपड़े की दुकान से नीरज ने जीनूस और?टी शर्ट का सौदा किया । दुकानदार ने उसकी कीमत ढाई हज़ार रुपये बताई नीरज ने कहा यह तो बहुत ज्यादा हैं कुछ कम करो इस पर दुकानदार ने पहले तो खूब कसमें खाईं फिर भाव ताव करते हुए इच्कीस सौ रुपये पर आ गया। बोला दो हज़ार रुपये में तो यह मुझे पड़ी है । फिर कसम खाकर बोला इतनी बड़ी दुकान लेकर बैठा हूँ क्या सौ रुपये भी नहीं कमाऊँ। नीरज जब जाने लगा तो दुकानदार बोला अच्छा बोलो कितना दोगे नीरज ने कहा बारह सौ रुपये से एक रुपया भी ज्यादा नहीं दूँगा उनमें काफी देर तक बहस हुई पर?नीरज टस से मस नहीं हुआ आखिर लुकानदार उसे बारह सौ रुपये में ही देने को तैयार हो गया। शीरज ने बारह सौ रुपये दिए वो उसने चुपचाप गिनकर रख लिए। नीरज ने जब उसको दोस्त को बताया कि ये दुकान से बारह सौ रौपये में लिए हैं मँहगे तो नहीं पड़े तब दोस्त ने कहा ठीक है उचित दाम ही हैं इनकी इससे अधिक कीमत है ही नहीं अगर इससे अधिक में खरीदते तो तुम्हें नुक्सान होता तब कहीं नोरज के मन को संतोष हुआ। जिनको मालूम चल जाता है कि सामने वाला झूठी कसम खा रहा है तो वे फिर उसकी बात नहीं मानते बल्कि अपनी बात मनवाते हैं। क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें भारी नुक्सान उठाना पड़ सकता है। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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