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व्यंग्य : अकेलेपन से त्रस्त

संयुक्त परिवार टूटने के बाद अनेक विसंगतियाँ साहने आई हैं जिसमें अकेलेपन से त्रस्त बहुत से सीनियर?सिटीजन मिल जाएँगे उनका हालचाल पूछने वाला कोई नहीं है। वे ऐसे पाश इलाके में आलीशान भवन में रह रहे हैं जहाँ कोई किसी से वास्ता तक नहीं रखता। लोग पड़ोस में रहते हुए भी एक दूसरे को जानते तक नहीं हैं।
इनमें ऐसे वरिष्ठ नागरिक भी मिलेंगे जिन्होंने अपने जीवन की शुरूआत गरीबी में की थी लेकिन बाद में खूब मेहनत करके उच्च शिक्षा प्राप्त कर के बड़े अधिकारी बन गए बच्चे पढ़लिखकर विदेश में बस गए पत्नी की मृत्यु हो गई अब वह अकेले रह गए हैं। पाश कॉलोनी में मकान लेना उनके लिए अभिशाप सिद्ध हो गया है । पैसा तो है पर सुख चैन नहीं है अकेलेपन से बड़ा कोई दुख नहीं जिसके ऐसे लोग शिकार हो गए हैं।
अशोक जी अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए थे। उनका लड़का अभिषेक विदेश में रह रहा था वो पिता का मकान बेचकर विदेश में घर खरीदना चाहता था पिता को उसने वृद्धाश्रम में में भेजने का निर्णय ले लिया था। वो बार बार उनसे मकान बेचने का दवाब बना रहा था। उसी दौरान अशोक जी के ऑफिस के बगल में चाय की दुकान लगाने वाला घीसीलाल मिला उसकी दुकान पर उसके लड़के ने कब्जा कर लिया था। वो शहर की गरीब बस्ती में रह रहा था मकान किराये से उसका खर्च चल रहा था। वो गरीबों की बस्ती थी मगर माहौल पारिवारिक था सब एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे एक दूसरे श का हाल पूछते रहते थे गरीब थे पर खुश और संतुष्ट थे। घीसीलाल ने बताया उसकी बस्ती में एक मकान बिक रहा है मात्र छः लाख रुपये में । यह रकम अशोक के लिए कोई बड़ी रकम नहीं थी। उन्होंने कुछ सोचकर वो मकान खरीद लिया। इसके बाद उन्हें अपना पाँश कॉलोनी वाला बंग्ला बाइस करोड़ रुपये में बेचना पड़ा उन पैसों से उनके बेटे ने विदेश में मकान खरीद लिया था इसके बाद बेटे ने उनकी कोई खोजखबर नहीं ली थी। आजकल वे घीसीलाल के बगल वाले मकान में पारिवारिक माहौल में रह रहे थे और बड़े ख़ुश थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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