सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : कड़वा बोलने वाले

यह बात सही है कि कड़वा बोलने वाले बहुत कम लोकप्रिय होते हैं वे न किसी के चहेते होते हैं न ही कृपापात्र न कोई उन पर अहसान करता है न वे किसी का अहसान लेना पसंद करते हैं। बोलते कड़वा जरूर?हैं मगर बात पते की करते हैं जिसमें भलाई छिपी होती है इनके बोल बुरे जरूर लगते हैं मगर हितकारी होते हैं।
दूसरी ओर मीठा बोलने वाले होते हैं हाँलाँकि मीठा बोलना अच्छा होता है मगर अधिक मिठास हमेशा अच्छी नहीं होती अगर मीठा बोलने वाला चापलूस और?मतलबी हो तो वो बहुत?बड़ा चालाक साबित होता है। मीठा बोल कर ये मुफ्त का चंदन घिसने में माहिर होते हैं जेब दूसरे की होती है और मज़े ये करते हैं ऐसे लोग किसी बड़े आदमी के दरबारी होते हैं जो उसके पैसे पर मौज करते हैं बदले में इन्हें बस जी हुज़ूरी करना होती है जो यह अच्छी तरह करना जानते हैं । 
सुरेश कड़वा बोलता था चाहे किसी को बुरा लगे या भला उसे पता चला कि दिनेश के दोस्त दुश्मन से मिलकर उसकी बुरी तरह पिटाई करने की योजना बना चुके हैं। दिनेश को उन्होंने रोक रखा है उससे बड़ी चिकनी चिपड़ी मीठी बातें कर रहे हैं उसकी खूब आव भगत की जा रही है मन पसंद नाश्ता कराया जा रहा है। मीठा बोलकर सब उसे खुश कर रहे थे दिनेश भी उन्हें अपना सबसे बड़ा हितैषी समझ रहा था। जबकि सुरेश जो कड़वा बोलता था वो दिनेश को उनकी साजिश का शिकार होने से बचाना चाहता था। उनमें से कुछ तटस्थ थे जो तमाशा लेखने के लिए रुके हुए थे। दिनेश को दुश्मनों के आने तक रोका जा रहा था। तभी दिनेश से सुरेश ने बहुत कड़वे लहजे में बात करना शुरू कर दी दोनों में गरमागरम बहस होने लगी सुरेश ने दिनेश को इतना नाराज कर दिया कि वो पैर पटक कर वहाँ से चला गया। वे मीठा बोलकर रोकने वाले इसके लिए तैयार नहीं थे। जब तक दुश्मन आए तब तक शिकार जा चुका था। दिनेश और सुरेश की बोलचाल बंद थी लेकिन जब दिनेश को मीठा बोलने वालों की साजिश का पता चला तो उसे सुरेश के कड़वे बोल अच्छे लगने लगे। उसने सुरेश से सॉरी बोला और उस दिन उसे बचाने पर उसका शुक्रिया अदा किया। पर सुरेश इन सबसे अप्रभावित रहकर अपनी टोन में उससे कड़वा ही बोलता रहा पर इस बार दिनेश को बिल्कुल बुरा नहीं लग रहा था।
****

रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...