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व्यंग्य : भूतपूर्व होने का दुख

कहते हैं कि संसार में दुख तो बहुत है पर सबसे बड़ा दुख भूतपूर्व होने का है। जिसमें व्यक्ति की मान प्रतिष्ठा रुतबा पद के छिनते ही मिट्टी में मिल जाता है जो झुकझुकक सलाम करते थे वे देखते ही मुँह मोड़ लेते हैं जो चाय मुफ्त में पीने को मिल जाती थी वो अब पैसे देने के बाद भी बेस्वाद मिलती है। कोई उधारी में सामान नहीं देता जो झुक कर बात करते थे वे आँखें तरेरते हैं।
हाकिम सिंह जब ग्राम के सरपंच थे तब सत्ताधारी दल के जिला संगठन मंत्री भी थे। उनका बड़ा रुतबा था उनके यहाँ हाजिरी लगाने अच्छे लोग आते थे । सब उनकी कृपा के आकांक्षी रहते थे। जिससे जो कह दिया सो कह दिया बस वाला उनसे कभी किराया नहीं लेता था। जबसे चुनाव हारे और प्रदेश में भी उनकी पार्टी हार गई तब से उनके बुरे दिन शुरू हो गए अब तक तो हवा में उड़ रहे थे चुनाव हारते ही जमीन पर गिरकर चारों खाने चित हो गए थे अब उनकी न तो कोई पूछ परख रह गई थी न सुनवाई हो रही थी। उनसे एक गलती हो गई वे अपने एक समर्थक को छुड़ाने थाने पहुँच गए। उनका मानना था कि प्रभारी महोदय उनके अच्छे परिचित हैं । मगर हुआ उल्टा उन्हें ही हवालात में बंद कर दिया पुलिस ने फिर अपने तरीके से उनकी खूब खातिरदारी की । तीन दिन बाद बड़ी मुश्किल से जमानत पर छूटे। अब उनकी रही सही हेकड़ी भी निकल गई थी। 
एक और भूतपूर्व का हाल बयान करने का मन है। वे एक कमाऊ सरकारी महकमें में अधिकारी थे। उनको डेढ़ लाख रुपये वेतन मिल रहा था पर उनका खर्च दसलाख रुपये महीने का था। पूरा परिवार उनकी रिश्वत की कमाई पर मजे कर रहा था। वे अब रिटायर हो गए थे । अस्सी हजार रुपये पेंशन मिल रही थी मुफ्त की सेवा बंद हो गई थी कोई उपहार देने वाला नहीं था घर पे अब कोई मिठाई का डब्बा और फलों की टोकरी लेकर नहीं आता था। उनकी हालत बड़ी दयनीय थी उनके दुख का कोई पारावार नहीं था। और सहानुभंति जताने वाला भी कोई नहीं था।अस्सी हजार की पेंशन तो उनकी ऊँट के मुँह में जीरे के बघार की तरह थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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