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व्यंग्य : ब्याज का चंगुल

ब्याज का चंगुल वो चंगुल है जिसमें फँसना तो आसान है पर उससे छूटना आसान नहीं होता लोग कर्ज लेकर बड़े खुश होते हैं जिसका लोन स्वीकृत हो जाए उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। उस समय वो इस पर तनिक भी विचार नहीं करता कि इसे अदा कैसे करेगा फिर नौबत यह आती है कि गिरवी रखी संपदा हाथ से निकल जाती है
अशोक जी ने मकान बनवाते समय एक साहूकार से पाँच लाख रुपये का कर्ज लिया था उसकी ब्याज दर भारी थी मकान उन्होंने कुछ ज्यादा ही अच्छा बना लिया था जिसकी छोटी मोटी उधारी बहुत लोगों की बकाया थी। कर्ज देने वाले ने भी तकाजा नहीं किया पाँच साल बाद पूरे बत्तीस लाख रुपये की वसूली करने वो अशॅक के पास आया तीन प्रतिशन मासिक चक्रवर्ती ब्याज बढ़ते बढ़ते पूरे सत्ताइस लाख रुपये हो गया था। इतनी बड़ी राशि का सुनकर अशोक जी के होश गुम हो गए कर्ज देने वाला दबंग था अशोक के पसा और लोगों का कर्ज भी था। हारका उसे वो मकान बेचना पड़ा उस पैसे से अशोक जी ने कर्ज अदा किया। आजकल वे किराये के मकान में रह रहें। हैं कभी कभी वे सोचते हैं अगर उन्होंने बिना कर्ज लिए मकान बनाया होता वो भले ही छोटा तो तो आज ये नौबत नहीं आती। कुछ लोगों की जुए सट्टे की लत होती है । वे भी कर्ज लेकर जुआ खेलते हैं या सट्टा लगाते हैं जिसमें प्रायः हार जाते हैं। और फिर जो कर्ज चढ़ जाता है उसे अदा करना उनके लिए बहुत?भारी पड़ता है। इनके परिवार के लोग हमेशा आर्थिक संकट में फँसे रहते हैं। इनके कारण सूटखोर खूब फल फूल रहे हैं। जमीन जायदाद के मालिक बन बैठे हैं और कर्ज लेने के आदि अपनी पूर्वजों की संपत्ति से भी हाथ धो बैसे हैं।।गरीबी में रहकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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