सुख के दिनों में अपनापन जताकर लाभ उठाने वालों की अच्छी खासी संख्या रहती है। जिससे यह पता ही नहीं चलता कि इनमें कौन सही है और कौन गलत। कहते हैं सच्चे दोस्त की पहचान दुख में होती है दुख में जो हमारे साथ खड़ा हो तथा हमें पूरा सहयोग दे वही सच्चा दोस्त होता है पर ऐसे लोगों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है।
जब कोई दुख से जूझता रहता है तब उसके साथ गिने चुने दोस्त ही होते हैं जो किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते न ही लाग लपेट की बातें करते हैं। जब व्यक्ति दुख से उबर जाता है । और जैसे ही उसके दिन बदलते हैं और सुख के साधन जुटने शुरू हो जाते हैं वैसे ही मतलबी और ख़ुदगर्ज लोग उस के करीब आना शुर्रू कर?देते हैं।तथा अपनेपन का वो अभिनय करते हैं कि सामने वाला पूरी तरह भ्रमित हो जाता है दुख के साथी न दिखावा करते हैं न लाग लपेट भरी बातें न उन्हें चापलूसी करना आता है इसलिए वे जल्दी ही दरकिनार कर दिए जाते हैं सुखी आदमी जब खुशामदियों को अपना चुका होता है इस लिए वो भी उन पर ध्यान नहीं देता सुख में उसे इसका बिल्कुल भी अंदाजा नहीं होता कि दुख में इनमें से कोई भी आसपास मँडराएगा तक नहीं।
रामनरेश सरपंच का चुनाव हार गए थे दो करोड़ का घाटा हुआ आर्थिक स्थिति पूरी तरह से ख़राब हो गई थी। अपनापन दिखाने वालों की भीड़ छँट चुकी थी जो दो चार साथ रह गए थे उन पर उसको इतना विश्वास नहीं था जबकि जिन पर उसका पूरा भरोसा था उनमें से कोई उसके साथ नहीं था। नरेश जी को बाद में पता चला कि जो उनका सब से खास सबसे सगा सबसे अजीज था वो जीतने वाले का खास बन गया था नरेश जी को तब पता चला कि इससे बड़ा अवसरवादी तो कोई दूसरा और हो ही नहीं सकता। लेकिन जो समय था वो तो गुजर चुका था। सब कुछ गँवा के होश आया तो क्या आया।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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