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व्यंग्य: आस्तीन के साँप

कुछ कथित मित्र आस्तीन की साँप की तरह होतेहैं जो अपने मौँह में विष लिए आपके साथ रहते हैं और आपकी मिटाने की ताक में रहते हैं ये लोग नफैरत और दुश्भनी को इतनी गहराई में छिपा रखते हैं कि उसकी खबर किसी को भी नहीं लग फाती जब यह अपनी कसर निकाल लेते ऐं तब इनका पता चलता है तब तक इतनी देर सै चौकी होती है ।कि सँभलने का भी वक्त नहीं मिलता है।

लाड़सिंह और रेशमलाल दोनों मित्र हैं । एक बार लाड़सिंह ने रेशमलाल से अपने मतलब लिए चोई बुरा काम चराना था यह करने से रेशमलाल ने साफ इंकार कर दिया। इस की गाँठ लाड़सिंह ने बाँध कर रख ली। उसने रेशमलाल से खुलकर दुश्मनी नहीं की ऊपर ऊपर दोस्ती का दिखावा करता रहा और भीतर दुश्मनी को छिपाए रहा जब तक उसने अपना बदला नहीं निकाल लिये तब तक उसने चैन नहीं लिया। यह मतलब के यार खाने में सबसे आगे रहते हैं और खिलाने का मौका आए तो पीछे हप जाते हैं यह खुद तो ऊपर नहीं पहौँच पाते लेकिन आपकी सीढी खींचने में उन्हें भरपूर मजा आता है। वे तो ऊँचाई पर कभी पहौँट नहीं सकते पर आपको भी पहौँचने नहीं देती चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी हद गिरना ही क्यों न पड़े। हम समाज में रहते हैं न तो हम सभी को दुश्मन मान सकते और नहीं उनके खिलाफ लड़ाई कर सकते हैं। दोस्त भी बनाना होगा और उन पर विश्वास भी करना ही पड़ेगा। क्योंकि हमें एच दूसरे से काम भी पड़ता है और उनकी जरूरत भी महसूस होती है। संसार में अच्छे मित्र से बढ़कर कोई नहीं है। हमारे अपने तो धोखा दे सकते हैं। पर सचचा दोस्त अपने दोस्त का किसी भी हाल में साथ नहीं । छोड़ते । ऐसा दोस्त अगर एक बार मिल जाए तो उसका साथ नहीं छोड़ते।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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