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व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं।
ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी।
किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो।
नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषावाद का सहारा लेकर सबके चाहेत बन गए तीन महीने बाद जब हम किसी काम से आए तो इन्हें मुख्य ऑफिस में काम करते हुए देखा। यह हमें छोटा समझकर हमारी तरफ देख भी नहीं रहे थे हमारे अभिवादन का भी इन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। पर जैसे ही बड़े साहब आए तो ये उनके दासों के भी दास बन गए हमारी इनसे दोस्ती तभी टूट गई। फिर किसी बात पर हमारी बड़े साहब से कहा सुनी हो गई। तो इन्होंने आग में घी का काम करते हुए साहब के क्रोध को ओर अधिक सुलगा दिया साहब ने हमारी वेतन वृद्धि रोक दी तो हम कोर्ट में चले गए कोर्ट में साहब को नीचे देखना पड़ा जज साहब ने उनकी कड़ी आलोचना की और ये अपना सा मुँह लेकर रह गए कोर्ट के निर्णय से हमारे साथियों को भी लाभ हुआ हम अपने सहकर्मियों के चहेते बन गए और ये साहब के सबसे बड़े चापलूस एक दिन फील्ड में काम न करते हुए भी साहब ने इन्हें बेस्ट कर्मचारी का सम्मान दिलवा दिया और हमैं दंड स्वरूप तबादले का दंड दिया गया । हमने संघ के माध्यम से वरिष्ठ कार्यालय में उनकी शिकायत करके उनके आदेश को रुकवा दिया। इसलिए हमें न कोई सम्मान मिला न प्रमोशन न सरकारी आवास फिर भी हमने बिंदास रहकर नौकरी की ओर इनके साथ ही रिटायर हो गए अनुभव तो बहुत हैं ।
लोगों को उनकी बात अच्छी लग रही थी सतीश जी वहाँ से जा चुके थे सूरज जी हीरो बन गए थे और वे जीरो हो गए थे। सुरेश जी को किसी बात का मलाल नहीं था। क्योंकि उनको सरकारी सम्मान नहीं मिले तो क्या हुआ लोगों ने उन्हें दिल से सम्मान दिया सुरेश जी को यह उपलब्धि सबसे बड़ी प्रतीत हुई।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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