आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं।
ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जेवर हड़प लिए थे। फिर उनका मकान बिकवाकर वो पैसे भी हड़प लिए और उनको घर ले आया। वहाँ लाकर बची खुची धन संपत्ति भी हथिया ली और उन्हें घर से बाहर निकाल दिया दो दिन तक वे भूखी प्यासी एक पेड़ के नीचे पड़ी रहीं रात में ही उनके प्राण पखेरू उड़ गए उनके मरने पर रविकाँत को कोई दुख नहीं हुआ था। वही रविकाँत अपने माँ बाप का मरने के बाद श्राद्ध का आयोजन कर रहा था। उनकी बड़ी तस्वीर पर माला चढ़ी हुई थी भोजन करने वाले दबे स्वर में बाते कर रहे थे की रविकाँत ने कभी अपने माँ बाप की सेवा नहीं की और अब देखे कैसे भव्य रूप से उनके श्राद्ध का आयोजन कर रहा है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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