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व्यंग्य: निठल्ले

ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे जो कोई काम नहीं करते कहीं से एक रुपया भी नहीं कमाते और सो दो सो रुपये रोज खर्च करने के बाद भी अलमस्त बनकर रहते हैं । दूसरी ओर ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें अपने काम से कभी फुर्सत ही नहीं भिलती ऐसे लोग पैसा कमाने की मशीन बनकर रह जाते हैं काम में और काम के तनाव में रहते हुए अपना सारा समय गुजार देते हैं। कुठ लोगों में ये गलतफहमी होती है कि उनके बिना कोई काम होगा ही नही ये लोग अपने को सबसे अधिक योग्य समझते हैं। यह भी जिंदगी जीने का लुत्फ नहीं उठा पाते।
शहर से दस किलोमीटर दूर स्थित गाँव रतन खेड़ी के जीवन दादा की उम्र चालीस वर्ष की हो गई थी। उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई काम नहीं किया था। उनके पास बीस एकड़ सिंचित जमीन थी। पहले उनके पिताजी खेती करते थे फिर पिताजी के बाद उनकी माँ और पत्नी ने खेती का काम सम्हाल लिया अब उनका लड़का रोहित अठारह साल का हो गया था और उसने खेती के काम में हाथ बँटाना शुरं चर दिया था। जीवन दादा का रोज की दिनचर्या ऐसी थी की सुब्ह वे नित्य नियम पंरे कर ठीक साढ़े नौ बजे खाना छाकर तथा पाँच सौ रुपये लेकर अपनी भोटर सायकिल से शहर आ जाते थे दिन भर शहर में रहकर अपना समय गुजारते थे। तथा रात को साढे नौ बजे से पहले कभी घर वापस नहीं आते थे उनका यह क्रम पिछले बीस साल से चल रहा था आठवीं पास करने के बाद चार साल उन्होंने शहर में रहचर पढ़ाई की थी। उस समय उनकी जो मित्र मंडली बनी थी वो आज तक कायम थी वे अपना दिन उन्हीं के बीच में गुजारते थे। उनके पिताजी ने उनपर कोई रोक नहीं लगाईशे थी शादी के बाद भी उनकी पत्नी भी उन पर रोक नहीं नहीं लगा सकी थी । । हैरत की बात तो यह । है कि जीवन दादा जैसे लोगों का जीवन भी चलता रहता है । इनमें कोई महत्वाकांक्षा भी नहीं रहती है। दूसरी और जिन्हें धन चमाने का नशा है वो पैसे कमाने मैं ही व्यसूत रहते हैं इनके बीच वो लोग भी होते हैं जो मध्यम मार्ग अपनाते है ऐसे लोग काम भी करते है और अपने लिए भी फुर्सत निकाल लेते हैं तथा जीने का भरपूर आनंद उठाते हैं।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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