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व्यंग्य: खुन्नस खाए हुए

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दुश्मनी को बहुत गहराई में छिपाकर रखते हैं ऊपर ही ऊपरी गहरे दोस्त बनने का दिखावा करते हैं ये खुन्नस खाए हुए लोग उस बह़े से बड़े दुश्भन से भी अधिक खतरनाक होते हैं जो खुलकर दुश्मनी करता है कभी ऐसा भी होता है कि ये खुन्नस खाए हुए लोग बार बार मुँह की खाते हैं फिर भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते आपने ऐसे कई लोग देखे होंगे जो दूसरों को मिटाने में खुद पूरी तरह मिट गए पर उसका बाल बाँका भी नहीं कर पाए।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अकारण ही खुन्नस खाए रहते हैं। जबकि संबंधित का उनसे कुछ लेना देना नहीं होता तब भी वे नुक्सान पहुँचाने की ताक में रहते हैं और हर बार असफल होने के बाद भी चुप नहीं बैठते।
ऐसे ही एक विकास कॉलोनी में महेश वर्मा जी रहते थे । उनसे उनके एक परिचित सुरेश जी ने कहा कि आपके पड़ोसी मुकेश जी से आपकी लड़ाई चल रही है क्या वे बोले नहीं तो। आप ऐसा क्यों कह रहे हैं । तब उन्होने कहा वे आपकी खूब बुराई करते हैं दिन रात आपको बद्द्आएँ देते हैं। इस पर महेश जी बोले हमारी उनकी तो खूब बातचीत होती है। ऐसा तो नहीं लगता। महैश जी ने इसके बाद भी मुकेश जी से झगड़ा नहीं किया। महेश जी और मुकेश दोनों एक ही कारखाने में काम करते थे दोनों लेबर थे । लेकिन महेश जी ने अपने काम को ठीक से किया तो उनका प्रभोशन हो गया और वे सुपर वायजर बना दिए गए। यह मुकेश जी से सहन नहीं हुआ उन्होंने प्रबंधन से झगड़ा किया अपने काम के प्रति घोर?लापरवाही दिखाई जिससे उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया यह बात भी उन्हें बुरी लगे और महेश जी से उनकी नफरत बढ़ गई मुकेश ने होटल खोल ली वो भी ज्यादा नहीं चली और अब वो फुटपाथ पर कुछ सामान बेचकर मुश्किल से अपनी गुजर बसर कर रहे हैं। जबकि महेश जी को मार्केटिंग का काम सौंप दिया गया जिससे उनकी आय कई गुना बढ़ गई पक्का मकान बना लिया कार खरीद ली। और मुकेश की हालत बद से बदतर हो गई। इसके साथ ही मुकेश की नफ़रत बढ़ती ही चली गई। अगर मुकेश ने महेश जी से खुन्नस नहीं रखी होती तो आज उनकी ऐसी हालत नहीं होती। मुकेश जैसे लोगों का हश्र देखकर यही लगता है कि अकारण किसी का बुरा करने वाले का कभी भला नहीं हो सकता। वे अपने हाथों से ही अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर लेते हैं।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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