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व्यंग्य: बराबरी न कर पाने वाले

जो बराबरी नहीं कर पाते वे जलने लगते हैं उनमें ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हो जाता जै जिसके कारण वे जलन रखने लगते हैं इन जलने वालों में अधिकतर वे होते हैं जो हमारे जाने पहचाने होते हैं कुछ ऐसे भी हैं कि जलने वालों को जलाने में उन्हें मज़ा आता हैं उसमें कुछ मजे लेते हैं वे जलने वाले जलाकर उसक आँच में अपने हाथ सेंक मज़ा उठाते हैं। इन जलने वालों पर किसी के भी उपदेश ज्ञान का कोई प्रभाव नही पड़ता यह किसी का काम बनता हुआ नहीं देख सकते जब किसी का काम बिगड़ जाता है तब इनके कलेजे को बड़ी ठंडक पड़ती है ये ख़ुशी से झूम उठते हैं।
शंकर और रोहित गाँव से दूध इकठ्ठा कर सायकिल पर रखकर शहर में लाकर बेचते थे। शंकर अक्सर सोचता अगर उसकी खुद की डेरी हो तो कितना अच्छा रहे उसके पास पाँच एकड़ खेती भी थी। वो जब यह बात रोहित से कहता तो रोहित उसकी खिल्ली उड़ाता। एक दिन रोहित ने कहा तुम्हें डेरी खोलना है तो खोल लो ।मुझे कोई मतलब नहीं अपना तो यह काम ही भला इसमें कोई झंझट नहीं।
शंकर ने डेरी के लिए लोन लिया जिससे डेरी बनवाई चार भैंसे और दो गाएँ खरीदीं तथा डेरी शुरू कर दी डेरी चल निकली शंकर ने पिक अप खरीद ली जिसमें उसकी डेरी का दूध तथा आसपास के पशुपालको से लिया गया दूध जाने लगा शंकर की अच्छी कमाई होने लगी यह रोहित का जलन का कारण बन गई जब शंकर ने कार खरीदी तब तो रोहित जल भुनकर खाक हो गया। उससे शंकर की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 
रोहित को भी खुश होने का मौका मिला जब शंकर की डेरी में आग लग गई उसकी तीन दुधारू भैंसे जलकर मर गई थीं। उसके पास दो गाएँ और एक भैंस बची थी। रोहित की खुशी का ठिकाना नहीं था। शंकर के शुभ चिंतक उसे दिलासा दे रहे थे। रोहित की ये खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी जैसे ही शंकर को बीमा के पैसे मिले उसने डेरी का काया कल्प कर दिया अब उसकी डेरी पहले से अच्छी चलने लगी थी। रोहित की खुशी गायब हो गई थी और वो फिर से शंकर से जलन रखने लगा था। क्योंकि वो बराबरी तो कर नहीं सकता। ऐसे में जलन ही रख सकता था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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