एक कहावत है कि जो दूसरों के लिए गढ्ढा खोदता है वो एक दिन खुद उस में गिरता है । अपनी गलतियों की जब हमें सजा मिलती है तो इसका दोषी हम दूसरों को नहीं ठहरा सकते। जो दूसरों को परेशान करने के लिए नियम बनाते हैं वे खुद उनकी ही परेशानी का कारण बन जाते हैं।
सबसे बड़ी गुलामी होती है वैचारिक गुलामी या थोथे संकल्प या अभिमान में चूर होकर किए गऐ प्रण। एक ने प्रण कर लिया कि वो कल पूरे दिन अन्न जल ग्रहण नहीं करेगा मौन व्रत रखेगा तथा आसन पर न तो बैठेगा न शैया पर आराम करेगा। लोगों ने उसके प्रण सुनकर खूब ताली बजाई और उसकी खूब तारीफ की दूसरे दिन उसके पास दस लोग सुब्ह से ही आ गए। उन्होंने उसे एक पल के लिए भी ओझल नहीं होने दिया। दोपहर तक तो जैसे तैसे उसकी हालत ठीक रही दोपहर बाद वो भूख और प्यास से बेहाल हो गया। जब उसका व्रत पूरा हु
आ तब वो बेहोश हो गया था। लोगों ने उसे निजी अस्पताल में भर्ती करा दिया जहाँ वो तीन दिन रहा जिसका बिल सत्तर हजार रुपये आया जो उसने कर्ज लेकर अदा किया दस दिन रुपया कमाने नहीं जा सका पूरे एक लाछ की चपत लगा बैठा उसका अन्न जल त्याग कर मौन व्रत का प्रण। ये प्रण उसने स्वये किया था। किसी ने उस पर इसके लिए दवाब नहीं डाला था न ही बाध्य किया था। ये उसका अपना ही प्रण था।
समझदारी इसी में है कि अपने विचारों के भी गुलाम मत बनो। समय परिस्थिति को देखकर निर्णय लो और उसके अनुसार अपने कदम बढ़ाओ। खतरा देखकर पीछे हटने में कोई बुराई नहीं नदी में जब उफान आया होता है तब लोग किनारे रहकर उसे देखते हैं कोई उसमें छलाँग लगाने का साहस नहीं करता। कुछ गिने चुने लोग होते हैं जो ऐसा कर पाते हैं पर इसके लिए उन्हें जान की बाजी लगाना पड़ती है एक खबर सुनी थी जिसमें शहर के एक मशहूर साँप पकडने वाले की मौत साँप के काटने से हो गई थी। दूसरों को साँप से बचने की सलाह देने वाला खुद सर्प दंश का शिकार होकर अपनी जान से हाथ धो बैठा था। रीतियाँ कुरीतियों में बदल जाती हैं । फिर भी लोग उनका निर्वहन करते हैं। और गहरी परेशानी में पड़ जाते हैं। समय और परिस्थिति देखकर अपना रुख बदलने में कोई बुराई नहीं है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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