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व्यंग्य : हमेशा फुरसत में रहने वाले

समाज में कुछ लोगों ऐसे भी मिल जाएँगे जो हमेशा फुरसत में रहते हैं और कहीं पर भी किसी के साथ चले जाते हैं यह समाजिक कार्यों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं। घर पर इनसे कोई कुछ कहने वाला नहीं होता। न इन्हें घर गृहस्थी की कोई चिंता रहती है । किसी के साथ मेहमानी करने चले गए और दस दिन बाद भी आए तो भी इनके परिजनों की इनकी चिंता नहीं रहती।
इन्हें अपने भोजन पानी की भी चिंता नहीं रहती कहीं से भी इन्हें खाना मिल ही जाता है। यह फुरसत में रहने वाले लोग ऐसे ही नहीं बन गए । किसी को काम करना अच्छा नहीं लगा। किसी को नौकरी रास नहीं आई किसी के परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत है। उनके पिताजी सारा काम सम्हाले हुए हैं और उनके पास फुर्सत ही फुरसत है।  
ऐसे ही शहर के एक फुरसतिया हैं जिनका नाम सौरभ है उनकी उम्र पैंतीस साल की हो गई शादी हो गई दो बच्चे भी हो गए । लेकिन सौरभ ने आज तक एक रुपया भी कमाकर घर में नहीं दिया फिर भी उनके परिजनों को सौरभ से कोई शिकायत कभी नहीं रही। सौरभ की पत्नी नौकरी कर रही थी। मकान किराये से दे रखा था जिससे हर महीने तीस हजार रुपये की कमाई हो रही यह कोई छोटी रकम है। इसलिए सौरभ को नौकरी कर के रुपया कमाने की क्या जरूरत है। सौरभ जी दोपहर भें श्मशान घाट पर किसी की शवयात्रा में गए थे तथा शव के दाह संसचार में बढ़ चढ़कर सहयोग दे रहे थे। शाम को एक विवाह समारोह में बड़ी तन्मयता से काम करने में जुटे हुए थे स्टेज सजा रहे थे तो कभी मैरिज गार्डन में किसी मेहमान को ठहरने की व्यवस्था करा रहे थे। दोपहर में कुछ ओर थे शाम को कुछ ओर घर प हुँचे तो रात को साढ़े ग्यारह बजे एक दोस्त का फोन आ गया। कहा गया । फौरन सिटी हास्पिटल आ जाओ । ब्लड की जरूरत है तुम्हें एक यूनिट ब्लड डोनेट करना है। सौरभ बिना एच पल गँवाए अस्पताल पहुँचे। ब्लड डोनेट कर रात को साढ़े तीन बजे घर पहुँचे। दोपहर बारह बजे नींद खुली तो झटपट तैयार होकर शाम को दोस्त की भाई की शादी में बाराती बनकर पहुँच गए शादी निर्विघ्न संपन्न कराने में सौरभ ने अहं भूमिका निभाई। फिर बारात जब लौटकर आई तो अन्य रस्मों को निभाने में सहयोग देने लगे। सौरभ जब घर से निकलते तो किसी को नही कहते कि कब तक लौटचर आएँगे। सौरभ जी को रोज उनकी माँ दो सौ रुपये रोज देती थी और वे जब लौटाते तो उनकी जेब में एक रुपया भी नहीं बचता था। सौरभ जैसे लोगों की घर में भले ही पूछ परख नहीं होती लेकिन बाहर इनको भरपूर सम्मान मिलता है। । यह तीनों कालों में एक जैसे ही रहते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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