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व्यंग्य: दूसरों की दम पर शेर बनने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अकेले और अनजान जगह पर हों तो डरे सहमे भीगी बिल्ली की तरह नजर?आते हैंऔर वही जब जान पहचान वालों के बीच में हों तो शेर दिल बन जाते हैं यह लोग कभी अपनों को बडी परेशानी में डाल देते हैं। फिर भी उन्हें अपने किए पर कभी अफसोस नहीं होता और फिर मौका मिलने पर दुबारा वही हरकत करने से बाज नहीं आते।
इसी तरह के एक व्यक्ति थे राकेश वे एक बार अपने चार परिछितों के साथ कहीं गए थे। उनकी दम पर वे शेर बन चुके थे और हर किसी से झगड़ा मोल ले रहे थे साथ वाले उनसे परेशान हो गए थे किसी तरह समझा बुझाकर साथ वाले झगड़ा टाल रहे थे पर एक जगह तो अति हो गई जब राकेश ने बिना किसी बात पर एक युवक पर थप्पड जड़ दिया यह देखकर वे चारों सकते में आ गए इसके बाद भी राकेश के तेवर नरम नहीं हुए। वो युवक स्थानीय था । थोड़ी देर में अपने पचास साथियों को लेकर आ गया उन चारों ने राकेश को कहीं छिपा दिया वे तो यह कह कर चले गए कि कहीं तो मिलेगा कभी तो मिलेगा थप्पड़ का बदला तो निकाल कर रहेंगे और दूसरे ही दिन ऐसा हुआ कि वे बस में बैठकर किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे थे खिड़की पर बैठे हुए थे उस युवक ने उन्हें पहचान लिया तुरत अपने साथियों चो बुलाया उन्हें बस से उतारा वे खूब रोए गिड़ गिड़ाए माफी माँगी पर वे नहीं पसीजे एक थप्पड़ के बदले सबने उन्हें थप्पड़ मार मार कर बेदम कर दिया जोरदार पिटाई ने उनके अंजर पंजर ढीले कर दिए। उनके हाल देखकर कोई उनका पक्ष लेने को तैयार नहीं हुआ। कई दिनों तक वे घर से बाहर नहीं निकले।
दूसरों की दम पर गरजने वालों में वे भी होते हैं जो किसी टपोरी को कर्ज दे देते हैं जिसकी वसूली के लिए वे किसी को ले के जाते हैं ताकि अगला उनसे झगड़ा न कर सके। साथ वाले को यह डर की कहीं झगडा न हो जाए और वो बिना वजह ही इस लपेटे में न आ जाए। पुराने ज।माने की कहावत है कि अगर साहूकार को उसका कर्जदार जंगल में मिल जाए तो उससे वो कभी अपने कर्ज की वसूली का तकाजा नहीं करेगा और वही गाँव की काँकड़ पर आकर अपने असली रंग में आकर कर्ज का तकाजा चरना शुरू कर देता है।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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