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व्यंग्य: बुरे लोगों की मिठास

बुरे लोग अग हमसे खिंचे से रहे हमसे कोई वास्ता नहीं रखें तो इससे अच्छी और कोई बात नहीं हो सकती लेकिन जब बुरे लोग हमसे अपनापन बताने लगे चिकनी चिपड़ी बात करने लगे तो उनके ऐसे कामों से कोई ख़ुशी नहीं होती बल्कि मन सोच में पड़ जाता है कि इसके भीतर कौन सी खोट छिपी हुई है आखिर हमसे ये क्या चाहता है इसने जीवन में कभी किसी का भला तो किया नहीं तो हमारा क्या करेगा।
यह बात उन लोगों पर लागू होती है। जिन्हें भले बुरे की अच्छी पहचान होती है। जो इनसे धोखा खा के बैठे होते हैं। जो लोग इनको समझ नहीं पाते वो इनके दंश के शिकार होकर अपना बहुत कुछ खो चुके होते हैं। ये बुरे लोग अपना काम निकाल कर ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग मतलब निकलने के बाद ये आपसे वास्ता पूरी तरह खत्म कर लेते हैं आपको देखकर कन्नी काट लेते हैं। 
ऐसे ही हमारे एक परिचित रोहित जी से बात हुई जो बड़े पीड़ित आहत और दुखी दिखाई दे रहे थे। हमने उनसे जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने मंच पर बैठे एक नेतानुमा व्यक्ति की तरफ इशारा किया जिसका नाम राकेश था । बोले मेरी परेशानी का कारण मंच पर बैठा हुआ ये आदमी है। यह मुझसे मेरा मनचाहे स्थान पर तबादला कराने के नाम से पूरे डेढ़ लाख रुपये लूट कर बैठा है आज पूरे दो सा? हो गए हैं न तो इसने मेरा तबादला कराया है न ही मेरे इसने रुपये वापस किए हैं। मुझ से दूरी बना ली है बातचीत करना बंद कर दी है फोन नहीं उठाता है आज पकड़ में आया है। और फिर कार्यक्रम खत्म होने के बाद ये जैसे ही उसकी तरफ बढ़े तो भीड़ में फँस गए ये जब तक उसके पास पहौँच पाते इसके पहले ही वो विधायक जी के साथ आई गाड़ी के काफिले में से किसी एक में बैठकर जा चुका था। और रोहित जी फिर दुखी हो गए थे हमने उनसे कहा आप इसकी बातों में कैसे आ गए सब जानते हैं ये शहर का नंबर एक का झाँसे बाज धोखेबाज आदमी है इससे कोई वास्ता नहीं रखता। रोहित जी बोले तब हमें इसके विषय में कुछ पता नहीं था। 
नैतिक मूल्यों के पतन आपस के भरोसे को खत्म करने में इन लोगों का बड़ा भारी योगदान रहा है। ऐसे लोग किसी न किसी को अपना शिकार बना लेने में सफल हो ही जाते हैं ये बड़ी सावधानी से घात लगाकर बैठते हैं जब तक यह शिकार को पूरी तरह दबोचकर बेबस नहीं कर लेते तब तक शिकार यह समझ ही नहीं पाता कि अचानक उस पर यह कहर कैसे टूट पड़ा।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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