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व्यंग्य: अपना बनाकर मीठा जहर देने वाले

कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो बातें तो सबके भले की कहेंगे खूब अपनापन भी जताएँगे। मगर दिल से कभी नहीं स्वीकारेंगे ये वो लोग हैं जो अपना बनाकर दवा के नाम धीमे धीमे मीठा जहर देते हैं जब तक कोई इनकी फितरत समझ पाता है तब तक ये अपना काम कर चुके होते हैं।
ऐसा ही एक उदाहरण नरेश का है जो बारह हज़ार रुपये में एक जगह पर?कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी कर रहा था। उसे शहर के ऐक प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी जिनका शहर में बड़ा नाम था सोहन जी ।
उन्होंने उसे अपनी बातों के जाल में फँसाना शुरू किया। नरेश उनसे प्रभावित तो था ही सो उनकी बातों में आ गया उन्होंने उसे सरकारी नौकरी दिलाने का पक्का वादा करके उसकी नौकरी छुड़वा कर अपने यहाँ रख लिया उससे कहा पंद्रह दिन में नौकरी लगवा दूँगा तब तक हमारे यहाँ काम करो। नरेश उनके यहाँ मुफ्त में काम करता रहा और वे चिपुड़ी बातें करके भरमाते रहे ऐसा करते करते पूरे दो महीने हो गए उसे वेतन के नाम पर एक रुपया भी नहीं दिया गया था आज कल कहकर टरकाया जा रहा था। एक दिन नरेश ने उनसे कहा कि एक सरकारी विभाग में संविदा पर कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी है मैं वहाँ आवेदन दे आया हूँ अगर आप मेरी सिफारिश करेंगे तो मेरी नौकरी लग जाएगी नरेश की बात सुनकर उनकी आँखों में चमक आ गई वे बोले हाँ हाँ क्यों नहीं उस ऑफिस के प्रमुख मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं और फिर नरेश के सामने उन्होंने उनको फोन लगाया इधर उधर की बातें की ओर फोन रख दिया और बोले तुम चिंता मत करो। तुम्हारा काम हो जाएगा। नरेश के जाते ही उन्होंने साहब को फिर फोन लगाया और काम की बात बोले कहा आपके यहाँ नरेश का आवेदन आया होगा। वे बोले हाँ आया तो है उसका काम अच्छा है हम उसे रख रहे हैं तब उन्होंने साहब से साफ साफ कह दिया तुम उसे रख लोगे तो मेरा काम कौन करेगा। और नरेश के स्थान पर अपने नालायक भतीजे को रखवा दिया। नरेश की जब नौकरी नहीं लगी तो वो बहुत दुखी हुआ तो वे उसे फिर मीठा जहर देने लगे। उसे पाँच महीने हो गए थे उनके यहाँ काम चरते हुए अब तक सिवाय बातों के उसे और कुछ नहीं मिला था। जब नरेश वहाँ से आ रहा था। तब उस ऑफिस का चपरासी रामलाल उससे मिला और उसने उसे सारी बेत सच सच बता दी। सुनकर नरेश को गहरा धक्का लगा उसका मानसिक संतुलन गडबडा गया। उसे मनोचिकित्सक को दिखाना पडा जब वो कुछ ठीक हुआ तो पहले वाले मालिक ने उसे चौदह हजार रुपये महीने पर फिर से काम पर रख लिया था। काम करते हुए धीरे धीरे वो सदमें से उबर रहा था और?उन्होंने दूसरा शिकार ढूँढ लिया था और उससे मुफ्त मे बेगार करवा रहे थे। ऐसे लोगों से बचने का यही उपाय है कि इनसे दूरी बनाकर रखी जाए और इनकी चिपड़ी बातों पर ध्यान ही न दिया जाए।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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