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व्यंग्य: कम पढ़े लिखो के मजे

कुछ चपल चालाक लोग जो ज्यादा पड़े लिखे नहीं है पर किसी भी तरह से कामयाब हो गए हैं । वे पढ़े लिखों से ज्यादा मजे से रह रहे हैं और अक्सर पढ़े लिखे लोगों की खिल्ली उड़ाये दिखाई देते हैं। ये लोग अगर नेता बन जाएँ तो फिर इनके तेवर ही बदल जाते हैं। हाँलाकि पढ़ाई लिखाई के महत्व को नहीं नकारा जा सकता पर ऐसे लोगों का क्या करे।

जगमोहन जी की कपड़े की बड़ी दुकान थी उनको ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं आती थी लेकिन हर महीने उन्हें दस लाख रुपये का लाभ होता है। उनकी दुकान पर एक एकाउण्ट का काम करता है वो एम कॉम प्रथम श्रेणी से पास है। वे उसे बाइस हज़ार रुपये महीने वेतन देते हैं और उसकी पढाई लिखाई की खिल्ली उड़ाते रहते हैं जबकि वो दुकान का पूरा हिसाब किताब देख रहा था। ऐसे ही धीरज पाँचवी से आगे की पढ़ाई न कर सका तो नेता बन गया। चुनाव जीत कर गाँव का सरपंच भी बन गया। दूसरी उसी गाँव का रतनलाल जो उनके साथ पढ़ा था। वो बी ए पास करने के बाद भी स्कूल में चपरासी था। धीरज जब भी स्कूल आता तब ही रतनलाल को नीचा दिखाता रहता था। रतनलाल कोई जवाब नहीं दे पाता था।
धीरज की स्कूल में खूब खातिरदारी होती थी। और रतनलाल अपनी नौकरी बचाने की कोशिश ही करता रहता था। ये कम पढ़े लिखे लोग धनवान बनकर सब पर रौब गाँठते हैं और उन्हें अक्सर लज्जित चरते रहते थे। जब स्कूल के प्राचार्य ही धीरज की चापलूसी करते तो उसकी की क्या मजाल कि वो धीरज से कुछ कह सके
धीरज जी के अधिकारियों और राजनेताओअं से अच्छे संबंध होते हैं जिनके आधार पर वे सभी पर रौब जमाते रहते थे। और लोग यह सोचकर उनसे दबते थे कि वे नेता थे जो उन्हें कभी भी भारी नुक्सान पहुँचा सकते थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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