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व्यंग्य: हानि लाभ का गणित

हानि लाभ का गणित ऐसा है जिसका कोई सर्वमान्य सटीक फार्मुला नहीं है । कभी कभी ऐसा भी होता है कि जब कोई अनुभवहीन सोता है तब वो खूब लाभ में रहता है जो और अनुभवी हो जाता है तो हानि में आ जाता है वो समझ ही नहीं पाता कि ये हानि क्यों हो रही है। लगातार घाटे से अच्छे धनवान भी दरिद्र होते देखे गए हैं।
ऐसे लोग फिर भाग्य पर विश्वास करने लगते हैं । लेकिन जो समझदार होते हैं वे बुरे वक्त के खत्म होने की प्रतीक्षा करते हैं और तब तक अपना धैर्य बनाए रखते हैं क्योंकि आपत्ति काल में धैर्य ही काम आता है। जो हार नहीं मानना है जब तक हम हार को स्वीकार नहीं कर लेंगे तब तक हम हारे हुए नहीं माने जाएँगे। सफल व्यक्ति के दुश्मनों की भी कमी नहीं होती। यह लोग गलत हथकण्डे अपनाकर कभी कभी गहरी चोट दे देते हैं । इनसे बचते हुए अगर कोई सफल हो जाए तो वो सफलता स्थाई हो जाती। एक उदाहरण याद आ रहा है शहर के मध्य में ज्ञानीराम की होटल थी होटल अच्छी चल रही थी पूरा परिवार खुशहाल था। ज्ञानीराम के पास बहुत पैसे थे पर उन्हें लगता था कि होटल के व्यवसाय में कमाई तो है पर इज्जत उतनी नहीं है ऐसा उनके दोस्त भी कहते थे जिनकी बात पर ज्ञानी जी को भी विश्वास होने लगा था एक दिन अचानक ज्ञानी ने अपना अच्छा चलता हुआ होटल बंद कर दिया। और उसमें मेडिकल स्टोर खोल गया। आसपास कोई अस्पताल था नहीं। जितने जोर शोर से मेडिकल स्टोर खोला था वो जोश कुछ ही दिनों में ठंडा पड़ गया था। फिर से होटल व्यवसायशुरू नहीं कर सकते थे उनका स्वाबिमान आड़े आ रहा था। धीरे धीरे उनकी सारी जमा पूँजी खत्म हो गइ थी। और एक दिन वो भी आया जब उन्हें अपनी दुकान बेचना पड़ी उससे उधारी चुकता करके जो पैसे बचे उससे उन्होंने अपनी ही कॉलोनी में किराने की दुकान खोल लो थी और अब एक साधारण जीवन जी रहे थे। अब उन्होंने पुराने सुनहरे दिनों की याद करना शुरू कर दिया था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यव

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