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व्यंग्य: चंदे का धंधा

चंरे का धंधा ऐसा है जिसका सीजन कभी खत्म नहीं होता साल के पूरे दिन आयोजन के अवसर मिलते रहते हैथ उनमें से अधिकाँश आयोजन चंदे की राशि से ही संपन्न होते हैं यह बात उनकी नहीं है जो चंदा लेकर उसे ईमानदारी से सही जगह पर खर्च करते हैं यह तो उनके लिए है जिनका किसी भी प्रकार के आयोजन से कोई लेना देना नहीं होता।
ऐसे ही शहर में एक बड़ा और भव्य आयोजन हो रहा था जिसमें लगभग अस्सी लाख रुपये खर्च हुए थे सारा आयोजन चंदे की दम पर हुआ ।वहीं हमारी बात एक चंदाखोर आदमी राकेश से हुई उससे हमने कहा इसके आयोजक ईमानदार प्रतीत होते हैं । तभी तो इतना भव्य आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न हो सका। हमारी बात सुनकर राकेश कुटिलता से मुस्कुराया फिर बोला इसमें मैंने पूरे आठ लाख रुपये दबाए हैं हमने कहा कैसे वे बोले जब इस आयोजन की रूपरेछा बन रही थी उस समय मैं भी सक्रिय था ।जो रसीद कट्टे आए थे उसमें हेराफेरी करके मैंने एक कट्टा फर्जी प्रेस से ही उड़ा लिया था चंदा वसूलने की जिम्मेदारी मुझे भी सौंपी गई थी तो मैंने जो समिति का रसीद कट्टा था उसमें कम चंदा देने वाले की रसीद काटी और जिन्होंने ज्याद धनराशि दी उन्हें फर्जी रसीद दी रसीद पर भी मेरे हस्ताक्षर नहीं थे। राकेश बोला मैंने पूरा आठ लाख चालीस हलजार रुपये का चंदा इकठ्ठा किया था चालीस हजार का चंदा समिति के रसीद कट्टे की रसीद के आधार पर ली गऍई थी। आठ लाख की राशि हमारे फर्जी कट्टे के जरिए ली गई थी जब तक आयोजकों को इसकी भनक लगती तब तक हम अपना काम पूरा कर चुके थे आयोजकों को जब हमारे खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले तो उन्होंने हमें समिति सै निकाल दिया। हम भी यही चाहते थे। अब हमें इस साल एक पैसा भी नहीं कमाना है इसी पैसे को उड़ाना हृ। । हमें उनकी शातिरता पर कोई अचंभा नहीं हुआ क्योंकि चंदा खोरों के लिए ऐसा चरना कोई बड़ी बात नहीं है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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