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व्यंग्य: ऊँची पहुँच वाले

कुछ चपल चालाक किस्म के लोग किसी तरह से बड़े लोगों से संपर्क बनाकर दूसरों पर अपना रौब गाँठते हैं और अनुचित रूप से अच्छा खासा धन भी कमा लेते हैं । ऐसे ही गाँव के तिकज़मढाज नेता कम दलाल ने गाँव के स्थानीय शिक्षक का का प्रशासनिक रूप से तबादला करा दिया और बाद में एक लाख रुपये लेकर रुकवा भी दिया । ये लोग हद दर्जे के बेशर्म होते हैं मान अपमान की इनको परवाह नहीं होती ये तो बस अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। जिससे उन्हें मोटा लाभ होता है और दबदबा भी कायम रहता है।
ऐसे ही गाँव के किशन दादा है पाँचवी तक पढ़ने के बाद वे कुछ दिन तक आवारा घूमते रहे फिर चुनाव में नेताजी के समर्थक बन गए नेताजी के चुनाव जीतने के बाद किशन दादा की तो मानो लाटरी खुल गई देखते देखते उनका स्तर बदल गया । नई मोटर सायकिल ले ली किशन दादा का रोज का यही काम था सुब्ह आठ बजे घर से निकल जाते थे और रात के दस बजे के पहले कभी वापस नहीं आते थे। सारे ऑफिसों में उनकी सेटिंग थी पैसे लेकर काम कराते थे पैसे देने वाला काम होने पर उनका अहसान मानता था किशन दादा ने अपने जीवन में कभी एक धेला भी नहीं कमाया फिर भी उनका गाँव में सबसे आलीशान मकान था। किशन दादा टाइप के बहुत से लोग हैं जो व्यवस्था को दीमक बनकर चाट रहे हैं । इन्होंने आम आदमी में यह बात अच्छी तरह से बैठा दी है कि बिना लिए दिए कोई काम नहीं होता। ऐसे लोग बिचौलिया बनकर आम आदमी के साथ खुली लूट करते हैं जिस पर रोक लगाने की किसी में हिम्मत नहीं होती। गाँव के गोपाल दास पुलिस में रिपोर्ट लिखाने अकेले ही चले गए । उनसे गलती ये हो गई कि वे किशन दादा को अपने साथ नहीं ले गए पुलिस उन्हें ऐसे ही टरकाने वाली थी तभी किशन दादा का फोन आ गया पुलिस ने गोपाल दास जी को पकड़ लिया जेबों की तलाशी ली तो एक तंबाकु की डिबिया के साथ गाँजे की पुड़िया मिल गई। पुलिस ने उन्हें हवालात में बंद कर दिया। उनके परिजन किशन दादा के पास गए उनके खूब हाथ पैर जोड़े तब कहीं किशन दादा ने पूरे पाँच गुना रुपये वसूले तब गोपालदास को पुलिस के चंगुल से छुड़ाया जा सका। अपने विरोधियों से निपटना किशन दादा अच्छी तरह जानते थे। 
जब तक देश से दलालों बिचौलियों का खात्मा नहीं होगा तब तक भ्रष्टाचार का भी ख़ात्मा नहीं होने वाला।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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