कुछ आत्ममुग्ध लोग खुद अपनी ही तारीफ करने में जरा भी संकोच नहीं करते ये जहाँ भी जाते हैं वहाँ अपनी तारीफ करना शुरू कर देते हैं कुछ चालाक लोग इनका लाभ उठाते हैं वे भी उनकी तारीफ करके अपना मतलब हल चर लेते हैं इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी को बोलने का मौका ही नहीं देते घंटों बोलते रहेंगे सुनने वाले को केवल हाँ में हाँ मिलाना है उनकी बात का विरोध नहीं करना है ये लोग अपनी बात खत्म करने के बाद फिर नहीं रुकते वहाँ से चल देते हैं। उनके जाते ही सुनने वाला राहत की साँस लेता है।
ऐसे ही अपनी तारीफ सुनने के शौकीन अजीत जी के पास कुछ लोग आए बोले हम एक कार्यक्रम कर रहे हैं अगर आप पाँच हजार रुपये दें तो आपको हम कार्यक्रम का अध्यक्ष बना दे। यह सुनते ही उन्होंने तुरंत पाँच हजार रुपये रे दिए। कार्यक्रम के दौरान जब तक उनका गला मालाओं से नहीं भर गया तब तक उन्हें चैन नहीं पड़ा। आयोजक उनकी झूठी तारीफों के पुल बाँध रहा था और वो गदगद हो रहे थे इसके बाद वो धीरे से उनके कान में बोला दादा नाश्ते के पैसे नहीं हैं दो हजार रुपये दे दें तो कार्यक्रम और अच्छा हो जाए। अपनी तारीफ से फूले हुए अजीत जी ने फौरन दो हजार रुपये निकाल कर दे दिए। ऐसे लोगों को मंच पर बैठने की आदत सी पड़ जाती है। हालाँकि उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है पर ऐसे लोगों के पास पैसों की कोई कमी नहीं होती। ये तो अपनी मान प्रतिष्ठा के भूखे होते हैं जिसका फायदा खुदगर्ज उठाते हैं। इनके भाषण वही रटे रटाए उबाऊ टाइप के होते हैं । जिन्हें लोग ध्यान से सुनने का दिखावा करते हैं और बेवजह तालियाँ भी बजाते हैं। जिस दिन इनका कहीं फोटो नहीं छपता या नाम नहीं आता वो दिन उनके लिए सबसे दुखद होता है इतना सब करने के बाद भी वे बड़े नेता कभी नहीं बन पाते जबकि पैसे इनके खर्च होते हैं और उसका लाभ कोई ओर उठा लेता है। ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस खाने के अलावा और किया ही क्या जा सकया है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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