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व्यंग्य: महत्वाकांक्षी असफल लोग

सबसे ज्यादा दुखी वे लोग हैं जिनकी महत्वाकांक्षाएँ तो बहुत बड़ी हैं मगर क्षमता उतनी नहीं है ऐसे लोग जब बार बार असफल होते हैं तो और ज्यादा व्यथित हो जाते हैं ये लोग अपने आपको सबसे बड़ा समझते हैं और दूसरों को अदना। ये अक्सर दूसरों को औकात बताते हैं पर खुद की औकात भूल जाते हैं।
यह अभिमानी लोग अक्सर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं या दुनिया को ही दोष देने लगते हैं पर अपनी भूल को स्वीकार नहीं करते ये पीछे हटने को तैयार नहीं होते और आगे बढ़ नहीं पाते फिर अधर में ही झूलते रहते हैं। जब यह सबसे नफ़रत करने लगते हैं तो इनसे नफ़रत करने वालों की संख्या भी बढ़ जाती है फिर इन्हें कोई अपना नजर नहीं आता और फिर यह सबको दुश्मन समझने लगते हैं। वर्तमान से असंतुष्ट रहने से इन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता। यह धन पद प्रतिष्ठा को ही जीवन की उपलब्धि मानते हैं। और इससे सुख तथा ख़ुशी का आँकलन करते हैं इन्हें जब कोई कुटिया में रहकर साधारण जीवन जीने वाला अलमस्त मुफ़लिस मिल जाता है तो इन्हें उसे देखकर हैरत होती है। फिर ये उसे छोटी मानसिकता वाले लोग कहकर हिकारत से देखने लगते। हैं इनकी अति महत्वाकांक्षा इन्हें चैन नहीं लेने देती और यह लोग हमेशा बेचैन रहते। हैं यह सफल और कामयाब लोगों से ईर्ष्या द्वेष रखकर जलने लगते हैं और उन पर झूठे अनर्गल आरोप लगाकर उनकी सफलता को संदेह के कठघरे में खड़ा कर देते हैं यह भूल जाते हैं कि अगले ने सफलता पाने के लिए कितने प्रयत्न किए हैं कितने पापड़ बेले हैं तब कहीं वे इस मुकाम पर पहुँचे है झूठे आरोप लगाने वाले खुद अपना नैतिक पतन कर बैठते हैं जिसका जिम्मेदार वे खुद ही होते बैं। इस तरह के आरोप लगाने से उनके आगे बढ़ने की सारी संभावनाएँ खत्म हो जाती बैं । क्योंकि उनका मन यह स्वीकार कर चुका होता है कि सफलता गलत तरीकों से प्राप्त होती है । फिर वे भी गलत तरीने अपनाते हैं जिसके फलस्वरूप उनके आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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