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व्यंग्य: मुफ्त के मज़े

हर शहर में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने पास से एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं करते फिर भी जिंदगी के पूरे मजे लेते हैं यह मुफ्तखोर ऐसे रईस के बेटे से दोस्ती कर लेते हैं जो बिगड़ा हो अगर बिगड़ा हुआ न भी हो तो भी ये उसे बिगाड़ देते हैं फिर उससे अपना मतलब निकालते रहते हैं। जब यह देख लेते हैं कि अब इस तिली में तेल नहीं है तो उसका साथ छोड़ने में एक पल की भी देर नहीं लगाते।
ऐसे ही एक व्यक्ति था ओम प्रकाश जिसके पिताजी के पास पूरे बावन एकड़ जमीन थी। उसकी पूरे गाँव में इज्जत थी। लेकिन ओम प्रकाश उनकी बिल्कुल भी इज्जत नहीथ करता था उसे अपने पिताजी की हर बात बुरी लगती थी। वो खेती के काम में बिल्कुल हाथ नहीं बँटाता था। पिताजी ने उसकी शादी कर दी तब भी उसमें सुधार नहीं आया। वो पिताजी से कहता क्या रखा है खेती करने में सारी जमीन बेच दो और मजे करो। फिर वो नई नई स्कीम लेकर आता और कहता इसमें पैसा लगाओ फिर देखो कैसे पैसों की बरसात होती है। उसने जिन मित्रों को अपना समझ रखा था वे उससे मतलब की दोस्ती रखते थे। वो उन पर पैसे खर्च करता था इसलिए वे उसके साथ रहते थे। ओम प्रकाश की दशा जब बिगड़ी जब उसके पिताजी का अचानक निधन हो गया। उस दिन ओम प्रकाश मन ही मन बहुत खुश था अब उस पर रोक लगाने वाला कोई नहीं था सबसे ज्यादा उसके मतलबी दोस्त खुश थे। पिताजी के जाने के बाद ओम प्रकाश ने चार साल में पूरी जमीन बेच दी और सारा पैसा बर्बाद कर दिया। जब उसके पास कुछ नहीं बचा तो उहके मतलबी दोस्तों ने भी साथ छोड दिया। आजकल वो मजदूरी कर रहा है पिता जमींदार थे और बेटा मजदूर बन गया था। वो अब उन खेतों में मजदंरी कर रहा था जिनका कभी वो मालिक था। अब उसकी मदद करने वाला कोई नहीं था गाँव में उसकी बिल्कुल प्रतिष्ठा नही थी। अब उसे पिताजी की कमी खल रही थी पर अब तो उसका सब कुछ बर्बाद हो गया था रबड़ी मलाई खाने वाला निपनिया दूध की चाय पीने वाला अब मक्के की रोटी चटनी के साथ खाकर अपना लंच कर रहा था।  
यह केवल ओम प्रकाश की ही बात नहीं है ऐसे ओमप्रकाश जैसे कई युवक हैं जिनके अपने पिताजी से मतभेद हैं । और पिताजी से विपरीत चलकर खुश हो रहे हैं इनका हाल भी आगे चलकर ओम प्रकाश जैसा ही होना है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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