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व्यंग्य: झूठी शान दिखाने के फेर में

अपनी हैसियत से बढ़कर झूठी शान दिखाने वालों की कोई कमी नहीं है लोग ऐसा कर के आर्थिक संकट से घिर जाते हैं जिससे उबारने वाला कोई इनके सामने नहीं आता यह थोथी शान बघारने वाले लोग विवाह समारोहों में अनाप शनाप खर्च करते हैं दो दिन की चमक दमक में लाखों रूपये बर्बाद करने वाले लोग अपनी वर्षों की मेहनत से कमाई दौलत को फूँक देते हैं।
एक धनवान के यहाँ बेटी की शादी थी उसी मोहल्ले में एक साधारण हैसियत वाले व्यक्ति की बेटी की भी शादी थी। उसकी बराबरी करने की होड़ में उसने हैसियत से बढ़कर खर्च कर दिया। उस अमीर को तो कोई फर्क नहीं पड़ा पर शादी के बाद कर्ज की भरपाई करने के लिए इसे अपनी दो बीघा जमीन बेचना पड़ी जिससे वो किसान से मजदूर बन गया। दो दिन की चमक दमक ने उसके सारे जीवन को अंधेरे में कर दिया था। कुछ लोग हद से ज्यादा अभिमानी होते हैं वे अपने अलावा सबको हेय समझते हैं यह लोग भी शीघ्र ही बरबादी के कगार पर पहुँच जाते हैं ऐसे लोग दान धर्म में एक रुपया भी खर्च नहीं करते न कभी किसी जरूरतमंद की कोई मदद ही करते हैं परोपकार यह तभी करते हैं जब इनके अभिमान के आहत होने की संभावना प्रबल हो। वो जमाना गया जब लोग सादा जीवन उच्च विचार रखते थे अब तो न जीवन सादा रहा न सोच अच्छी रही ये घटिया सोच वाले लोग विलासिता का जीवन जीना अपनी शान समझते हैं। इनके बुरे हाल जब होते हैं जब इनका वक्त बिगड़ता है वक्त अगर बिगड़ जाए तो राजा को रंक बनने में देरी नहीं लगती। जब यह बर्बाद हो जाते हैं तब इनके पास कोई नहीं आता कोई हालचाल तक नहीं पूछता इनका आखिरी समय घोर गरीबी में कटता है जब इनके सामने इनका परिचित जिसे वे अपने से हीन समझते वो धनवान बनके आ जाए तब इनका दुख टाले नहीं टालता यह कुछ करने की स्थिति में नहीं होते इसलिए दुखी होकर मन समझाकर अपने सुख के दिनों की याद कर के मनमसोस कर रह जाते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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