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व्यंग्य: निंदा करने वाले

अपनी प्रशसा किसे अच्छी नसीं लगती कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जब कोई उनकी प्रशंसा नहीं करता तो वे खुद अपनी ही प्रशंसा करने लगते हैं ऐसे लोगों का फायदा वे मतलबी लोग उठा लेते हैं जो उनकी झूठी प्रशंसा करके अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वभाव से निंदा करने वाले होते हैं ये कभी किसी की तारीफ नहीं करते। और जब तक वे निंदा करने का कोई बिंदु नहीं तलाश लेते तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता जैसे ही उन्हें निंदा करने की वजह मिल जाती है वैसे ही वे निंदा करना शुरू कर देते हैं और ख़ूब जी भर के निंदा करते हैं। तब कहीं इनकी आत्मा को शाँति मिलती है ।
वो दिन बीत गए जब लोग निंदा करने वाले को अपने साथ रखते थे और उसकी किसी बात का बुरा नहीं मानते थे। तथा उसकी निंदा सुनकर अपने में सुधार करते थे वो दौर उच्च गुणवत्ता का था। लोगों के जीवन मूल्य भी उच्च कोटि के थे। आज का दौर तो वो दौर है जिसमें लोग पैसे देकर अपने प्रशंसकों की फौज खड़ी कर देते हैं जो घटिया घटिया चीज को भी स्टेण्डर्ड बना देते हैं खोटे सिक्के खरे को चलन से बाहर कर देते हैं। और खरा सिक्का मूल्यहीन होकर परे कर दिया जाता है। 
निंदा करने वालों से लोग अक्सर बचकर रहते हैं फिर भी ये किसी न किसी को अपना शिकार बना ही लेते हैं इससे इनका काम चल जाता है । दूसरे लोगों का कुछ भी हो उससे उन्हें कोई सरोकार नहीं होता। सकारात्मक तथा हितैषी की निंदा प्रेरणा दायक होती है ऐसी निन्दा हमें ऊँचाइयों पर पसुँचा देती है। निंदा करने का काम ऐसा है जिसमें जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं होता न ही जी तोड़ मेहनत और दौड़ धूप करने के बाद भी कुछ नहीं मिलता लेकिन आदत से मज़बूर लोग निंदा करने का एक भी अवसर नहीं चूकते।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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