सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : ज़रा सी खोट

ज़रा सी खोट खरे को पूरी तरह खरा नहीं रहने देती और कभी कभी इसके बहुत बुरे परिणाम आते हैं जो जीवन भर शराफ़त करता रहा वो अगर कभी जरा सा बुरा कर दे तो उसकी शराफ़त पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। जो यह कहते हैं कि कुछ नहीं होने वाला कौन देखने वाला है सब चलता है ।आजकल शराफ़त का जमाना नहीं है। कोरी तनख्वाह में क्या होता है थोड़ी ऊपर की कभाई भी होना चाहिए। ऐसे लोगों की बातें बड़ी मीठी और लुभावनी होती हैं और लोग इनकी बातों में आकर अपने जीवन को बर्बाद कर देते हैं।
यही अंजाम डॉ विमल प्रसाद जी का अंजाम हुआ वो शहर में फिजिक्स के अच्छे प्रोफेसर के नाम से जाने जाते थे। आजकल नौकरी से हाथ धोकर जेल की हवा खा रहे हैं सिर्फ एक जरा सी खोट ने उनको इस मोड़ पर ला दिया था । बात तब की है जब उन्होंने दसवीं बोर्ड की परीक्षा पास की थी उसमें उनके उन्सठ प्रतिशत अंक आए थे। वे मॉडल हायर सेकेण्डरी स्कूल में हायर मेथ से पढाई करना चाहते थे और सत्तर पर सेन्ट से कम अंक वालों को कॉमर्स दिया जा रहा था। उन्होंने दसवी रिपीट करने का मन बना लिया था तभी किसी ने उनकी एक फर्जी चतुर चालाक आदमीं से बात करा दी उसने एक लाख रुपये लेकर दूसरी मार्क शीट देने ची गारंटी दी जिसमें उनको अठहत्तर प्रतिशत अंक दिलाने की बात कही साथ ही यह दावा किया कि वो एकदम असली अंक सूची दिलवाएगा उसकी बोर्ड में अच्छी सेटिंग है। अंकसूची स्कूल के पते पर?आएगी और प्राचार्य की सील भी उसमें लगेगी। विनोद जी को उसकी बात जम गई पिताजी से तो उनकी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई पर माँ को उन्होंने भरमाकर उनसे एक लाख रुपये लेकर उस व्यक्ति को दे दिए दस दिन बाद उनकी अंक सूची स्कूल के पते पर आ गई कोई उसे नकली साबित नहीं कर पाया। उस अंकसूची के आधार पर उन्हें ग्यारहवीं भें गणित विषय मिल गया। उन्होंने खूब मेहनत की एम एस सी फिजिक्स सहित सारी परीउक्षाएँ सर्वोच्च अंकों के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की उनका चयन असिस्टेन्ट प्रोफेसर के पद पर हो गया कुछ साल बाद वे प्रोफेसर हो गए उन्होंने पी एच डी भी हासिल कर ली थी दसवीं की ऊकसूची छोड़कर सब कुछ चौबीस केरेट सोने की तरह खरा था । जब उनका प्रमोशन प्राचार्य के पद पर होने वाला था तब उनके निकटतम प्रतिस्पर्धी ने यह बात चयन कमेटी को बता दी कमेटी ने उनकी गोपनीय जाँच कराई तो वो बात सच निकली और इसके साथ ही प्रसाद जी के बुरे दिन शुरू हो गए पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया और उनका बुरा हाल कर दिया। कुछ दिन तक मुक्दमा चला और फिर उन्हें सजा मिल गई। सरकार ने उनकी सारी संपत्ति जप्त कर ली थी। 
ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे फिर भी लोग बुराई की दिशा में मुड़ जाते हैं और बुरे लोगों को अपना आदर्श मान अपनी जिंदगी बर्बाद कर देते हैं ये इतनी बुरी तरह टूटकर चकनाचूर होते हैं जिन्हें जोड़ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं होता।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...