सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: बेदिल बेईमान

अक्सर देखा जाता है कि जो लोग बेईमान भ्रष्ट रिश्वत खोर होते हैं वे बेदिल होते हैं उनमें न तो रहम होता है और न ही इंसानियत। भावना शून्य होते हैं ऐसे लोग इन्हें सिर्फ अपना मतलब दिखाई देता है ये लोग समाज में अनैतिकता को बढ़ावा देते हैं।
एक सरकारी कमाऊ विभाग में कार्यर थे सोहन बाबू ऊपर की आमदानी बहुत थी। पाँच हजार रुपये किलो की मिठाई खाते थे पर किसी ने कभी उन्हें एक रुपया किसी लाचार गरीब असहाय को दान करते हुए नहीं देखा था ऊपर की कमाई के पैसे वे ऊँची ब्याज दर पर कर्ज देने में चलाते थे और गरीब दुखी बेबस फटेहाल लोगों से बेरहमी से ब्याज की रकम वसूल करते थे इन्हें किसी का कोई डर नहीं था जो अधिकार थे उनका दुरूपयोग कर रहे थे।
ऐसे बेईमान लोग अपने साथ काम करने वालों को भी नहीं छोड़ते थे। एक विभाग में ईमानदार कर्मचारी मोहन बाबू कार्यरत थे। सीधे सादे सरल इंसान थे । साहब ने उन्हें लूप होल में डाल रखा था। उनके पिताजी बूढ़े थे । उनकी बीमारी के इलाज का बिल बारह लाख रुपये था। उन्होंने उसके भुगतान का क्लेम किया था वो बिल काट छाँट के चार लाख का कर दिया गया फिर उसको पास करने के लिए उनसे चालीस हज़ार रुपये की रिश्वत माँगी गई थी इसी बीच उनके पिताजी की तबियत अचानक बिगड़ गई वे उनके इलाज में व्यस्त हो गए उन्हें पैसे की सख्त जरूरत थी उनका लड़का विकास संबंधित से मिला उसने कहा चालीस हजार हमारे और बीस हजार भुगतान कराने के खर्च के साठ हजार रुपये दे दो तो कल ही पेमेन्ट करा देता हूँ। शर्त यही है कि साठ हजार रुपये नगद देना होंगे । लड़का वापस आया तो उनके पास साठ हजार रुपये नहीं थे पिताजी के इलाज में पाई पाई खर्च हो गई थी। उनके ऑपरेशन के लिए चार लाख रुपये अस्पताल वालों ने माँगे थे । विकास पिताजी जो अपने पिताजी का इलाज करा रहे थे उनको यह बताए बिना साठ हजार रुपये लेकर जब संबंधित के पास पहुँचा तो उसने कहा आप लेट हो गए हमने आपका कल शाम तक इंतजार किया फिर दूसरे का बिल पास कर दिया अब बजट खत्म हो गया। छः महीने बाद जब बजट आएगा तब देखा जाएगा। विकास को पता चला जिसको भुगतान किया गया उसके सारे बिल फर्जी थे। लेकिन उसने दो लाख रुपये रिश्वत में दिए थे। इससे उसका बिल हाथोंहाथ पास हो गया था और वो उन रुपयों पर ऐश कर रहा था । रिश्वत में दो लाख वसूलने वाले भी मौज कर रहे थे। विकास दुखी था। और गुस्से में भी इस गुस्से में उसने कुछ तीखे लहजे में बात कर दी इसको इश्यू बना लिया गया सारा स्टॉफ एक जुट हो गया उन्होंने काम बंद हड़ताल कर दी। उनकी यूनियन सक्रिय हो गई जब विकास को अरेस्ट कर लिया गया तब कहीं उनकी हड़ताल खत्म हुई। इधर मोहन बाबू का बेटा हवालात में था उधर उनके पिताजी इलाज के अभाव में दम तोड़ चुके थे अस्पताल वालों ने दो लाख रुपये लिए बिना शव देने से इंकार कर दिया था। बेचारे बदहवास घूम रहे थे इंसानियत मर चुकी थी लोग संवेदना विहीन थे इसका कोई निष्कर्ष नहीं है आगे क्या हुआ होगा इसका वर्णन करने की मुझमें भी हिम्मत नहीं है।

*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...