सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बनी को बिगाड़ने वाले (व्यंग्य)

कोई व्यक्ति गरीबी से जब ऊपर उठता है तब उसे ऐड़ी से चोटी तक का जोर लगाना पड़ता है। बनने में देर लगती जब बिगड़ने में जरा भी देर नहीं लगती। बराबरी करने वाले बहुत कम होते हैं और किसी की बढ़ती देखकर जलने वाले बहुत मिल जाएँगे। उनमें अधिकतर तो हमारे आसपास के हमारे अपने ही करीबी होते हैं। जो कोई संपन्न होता है तो उसके दोस्त हजार होते हैं और जब वो बर्बाद होता है तो अपने वाले भी उस से मुँह फेर लेते हैं। किसी ने ऐसे लोग भी देखे होंगे जो कभी जब धन संपन्न थे तब उनके यहाँ मेहमानों का ताँता लगा रहता था। हर महीने एक बोरा शकर आती थी जो सिर्फ चाय बनाने में ही खर्च हो जाती थी और जब वो बर्बाद हो गए तो उनकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं रहा। अब उनकी ये हालत हो गई कि दुकानदार भी उन्हें आधा किलो शकर उधार देने को राजी नहीं होता था।
जो कभी एक बोरा शकर उनके नौकर के कहने पर भिजवा देता था और महीनों पैसे की बात नहीं करता था और जब वे पैसे देते तो कहता था घर की तो बात है इतनी जल्दी क्या है। पैसे कहा क्या है वो तो कभी भी आ जाएँगे। आज वही आधा किलो शकर तक उधार देने को तैयार नहीं है। ऐसे ही एक गाँव के पटेल हरिसिंह थे। अस्सी एकड़ जमीन थी बहुत बड़ी हवेली थी। उनका नाम चलता था। कई लोग उनसे पल रहे थे। उनसे जलने वालों की भी कमी नहीं थी। उनके अपने भाई बंधु भी उनसे जलन रखते थे। उनका एक ही लड़का था राजेश। उसने बचपन से ही खूब पैसा देखा था। जब वो बड़ा हुआ तो मुफ्तखोरों के जमघट से वो घिर गया। पटेल साहब भी उसके खर्चों पर रोक नहीं लगाते थे। उसको उनके जलने वालों ने बिगाड़ना शुरू किया। सबसे पहले उसे अपने पिताजी का दुश्मन बना दिया। वो अनाप शनाप खर्च करने लगा। उसकी माँ मोह अंधी होकर बेटे का साथ देती थी। पटेल साहब यह सुनकर घबरा गए कि राजेश के ऊपर पचास लाख का कर्ज है। वो जैसे तैसे उन्होंने अदा किया तो जुए की लत में उसने तीन महीने में ही फिर उतना ही कर्ज चढ़ा लिया। उनकी जमीन बिकना शुरू हो गई। जब उनके पास बीस एकड़ जमीन बची थी वो भी बिकने को आ गई तो वे इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके। अचानक हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। राजेश पूरी जमीन बेच चुका था। उसकी हवेली भी बिक गई थी। उसका पक्ष लेने वाली माँ पागल हो गई थी और घर छोड़कर जाने कहाँ चली गई थी। राजेश एक झुग्गी में रह रहा था। पत्नी अपने बच्चों को लेकर उसे उसके हाल पर छोड़कर मायके चली गई थी। अब उसके पास आने वाला कोई नहीं था न उसकी कोई खोज खबर लेने वाला। गाँव वाले उससे नफरत करते थे। दुकानदार उसे उधार नहीं देते थे। वो कलंकित जिंदगी जी रहा था। घर का सारा सामान बिक गया था। एक दिन वो भी गाँव छोड़कर चला गया। गाँव वालों ने फिर उसे शहर की सड़कों पर भीख माँगते देखा था। और यही कहा था कि ऐसे इंसान का यही अंजाम होना था। कहते हैं गरीब से अगर कोई अमीर हो जाए तो उसे कभी गरीबी का मुँह नहीं देखना पड़ता। पर जो अमीर होकर बर्बाद हो जाए वो भी अपनी खराब आदत के कारण तो उसका फिर से अमीर होना कभी संभव नहीं होता। यही राजेश के साथ भी हुआ था।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...