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व्यंग्य: तब की बात और थी

आज के इस दौर की तुलना जब पुराने लोग अपने दौर से करते हैं तो उन्हें बहुत हैरत होती है । फिर वे इस दौर की बुराई करने लगते हैं जो आज के लोगों को अच्छी नहीं लगती कुणाल के दादाजी कह रहे थे हम जब डॉक्टर को दिखाते थे तो उनकी फीस दस रुपये थी और पाँच रुपये में दवाएँ आ जाती थीं कल पत्नी को दिखाया था पूरे आठ हजार रुपये अस्पताल में ही खर्च हो गए जबकि चार हजार की दवाएँ आईं। हमने अपने एक परिचित आर एम पी को बताया तो वे बोले इसमें आठ सौ रुपये की दवाएँ ही काम की हैं बाकी सब फालतू की हैं थोक में इन द वाओं की कीमत मात्र अस्सी रुपये है। वे बोले जबकि डॉक्टर ने अपनी फीस के दो हजार रुपये ले लिए छृ हजार रुपये जाँच के नाम पर वसूल कर लिए जबकि पत्नी को कोई बीमारी नहीं थी सिर्फ थोड़े चक्कर आ रहे थे वो भी बिना दवा खाए ही ठीक हो गए थे। 
यह सुनकर नितिन के दादाजी बोले बहू का अटेच मेंनूट करायेहा था जिसमें पूरे चालीस हजार रुपये खर्च हो गए। तबादला कराने के दो लाख रुपये लग रहे थे । जबकि हमारे जमाने में हमारा अटेट मेन्ट ए डी आई एस ने बिना कुछ लिए दिए ही करा दिया था और फिर हमारा तबादला हमारे मित्र ने भी बात ही बात में करा दिया था कोई लेन देन की तो बात ही न थी। आज तो यह हालत हो गई है कि बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया आज अपने दोस्त से भी कोई काम कराओ तो वो भी दलाली खा जाता है। बाजार में मँहगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार है। फिर दोनों दादाजी नैतिक पतन पर चर्चा करने लगे दोनों आज के दौर से घोर असंतुष्ट दिखाई दे रहे थे और पुराने दौर के सुनहरे दिनों में खोए हुए थे। जो उससे बाहर आना ही नहीं चाहते थे । जबकि आज का दौर एक कड़वी सच्चाई है जिसका स्वाद सबको चखना पड़ रहा है अब लोग जरूरतमंद की सहायता नहीं करते बल्कि उसकी मज़बूरी का अनुचित लाभ उठाते हैं और इसका उन्हें जरा भी मलाल नहीं होता।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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