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व्यंग्य: झूठी सहानुभूति दिखाने वाले

किसी के दुख में शामिल होकर संवेदना व्यक्त करना एक अच्छे इंसान के स्वभाव का हिस्स होता है लेकिन उन लोगों को हम क्या कहेंगे जो किसी को दुखी देखकर खुश होते हैं और सुखी देखकर चिढ़े रहते हैं ऐसे लोग किसी के दुख में जब शामिल होने जाते हैं तो खुशी को भीतर छिपा लेते हैं और अपनी क्रूरता का कोमल रूप दिखाते हुए झूठी सहानुभूति दिखाते हैं । और जब वह उन्हें अपना समझकर अपने मन की बात बताता है तो इन्हें भीतर ही भीतर बहुत मज़ा आता है और उपर से उनके सगे बनकर उस पर सहानुभूति का मल्हम लगाते हैं पर वो मल्हम नहीं होता वो एक तेजाब की तरह होता है जो उनकी पीड़ा को कई गुना बढ़ा देता है।
ये झूठी सहानुभूति दिखाने वाले लोग मौके का फायदा उठाकर अगले से वे सब बातें उगलवा लेते हैं। जो वो छिपाकर रखना चाहता था।
ऐसे ही एक थे अनोखी लाल वे अपने परिचित रवि के यहाँ संवेदना व्यक्त करने गए अनिल का दूसरा बेटा जो अभी एक साल का भी नहीं हुआ था । उसका निधन हो गया था। अनोखी इस से मन ही मन खुश हो रहे थे क्योंकि जब रवि के यहाँ दूसरे बेटे का जन्म हुआ था तब यह ईर्ष्या के कारण अकेले में फूट फूट कर रोये थे। उनके यहाँ पाँच लड़किया थीं जब अनोखी के यहाँ पाँचवी बेटी ने जन्म लिया था तब रवि के घर दूसरा भी बेटा जन्मा था। यह खबर सुनकर उनके तन बदन में आग लग गई थी जब उन्होंने उस बेटे के निधन की खबर सुनी तो उनके कलेजे को बड़ी ठंडक पहुँची। रवि के यहाँ घड़ियाली आँसू बहाने वाले अनोखी घर आकर अपनी पत्नी से कह रहे थे अच्छा हुआ इसका बेटा मर गया इसे अपने दो बेटों पर बहुत घमंड था । अब देखो कैसा घमंड चूर चूर हो गया।।
अनोखीलाल जैसे लोगों को कैसे अपना हितैषी समेझे जो दूसरों की उन्नति देखकर कुढ़े। और पतन देखकर खुशी को छिपाकर झूठी सहानुभूति जताए। ऐसे लोगों की खुशी बड़ी घातक होती है इसलिए इनका दुखी रहना ही अधिक अच्छा है ताकि सभी लोग खुशी रह सकें । अगर इनको खुशी मिली तो जरूर किसी न किसी पर आफत कहर बन कर टूटी है।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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