एक वो दौर भी था जब लोग कला पारखी होते थे प्रतिभाओं का सम्मान किया जाता था कलाकार को फनका को मान सम्मान के साथ ही अच्छा पारिश्रमिक भी मिलता था और एक यह दौर भी है जब कई अच्छी प्रतिभाएँ अवसर की कमी के कारण घुट रही हैं या उनका अनुचित दोहन किया जा रहा है। और जो दोहन कर रहे हैं वो उनका मान सम्मान तो दूर की बात उनको प्रति असंवेदन शील रुख अपना रहे हैं।
केदार बाबू अच्छे पैंटर थे विभाग में कोई बड़ा कार्यक्रम था बड़े साहब उसकी रूपरेखा बनाने में व्यस्त थे मंच को डेकोरेट करना था कुछ बोर्ड बनवाने थे कुछ चित्र पेन्ट कराने थे । जिस पेंटर से बात की उसने बहुत सारे रुपये माँगे जो साहब के बजट से बाहर था। फिर यह भी कहा कि समय कम है और तय समय?में काम पूरा नहीं कर पाऊँगा तभी किसी ने साहब से कह दिया कि अपने केदार बाबू हैं न वो अच्छे पेन्टर हैं उनकी ड्यूटी लगा दो कुछ पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे और काम भी चोखा हो जाएगा ।
केदार बाबू काम में डूबे हौए थे तभी चपरासी ने कहा आपको बढ़े साहब याद कर रहे हैं । चेदार बाबं तुरंत बड़े साहब के पास गए बड़े साहब को पद का बड़ा अभिमान था उन्होंने सीधे आदेशात्मक लहजे में कहा आपकी ड्यूटी कहीं ओर लगाई जा रही है पाँच दिन की समय सीमा में आपको तय काम पूरा करना है अन्यथा आपके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी अब आप जाइए और शर्मा जी से मिल लीजिए। शर्मा जी ने उन्हें सारा काम समझा दिया । काम देखकर केदार बाबू घबरा गए पंद्रह दिन का काम पाँच दिन में करना था उन्हें पेंटिंख की सामग्री लाकर दी गई वो भी पूरी नहीं थी शर्मा जी उसमें भी कभीशन खा गए केदार बाबू दिन रात अपने काम में जुटे रहे वे बहुत अच्छे आर्टिस्ट थे। काम उन्होंने तय समय में पूरा कर?दिया था पाँच हजार रुपये उनकी जेब से भी खर्च हो गए थे। साहब ने उनका काम देखा तो चकित रह गए लेकिन केदार उनके सामने अदना थे इसलिए उन्होंने उनकी तारीफ करना अपनी गरिमा के अनुकूल नहीं समझा केदार जी का अपनी बनाई पेंटिग पर नाम तक नहीं दिया गया था नाम उसी पेशेवर आर्टिस्ट का अंकित किया गया था। जिसने काम करने से इंकार कर दिया था वो भी केदार जी की कला देखकर चकित था। बाद में पता चला की साहब ने उसका झूठा बिल बनाकर पूरे डेढ़ लाख रुपये हड़पे थे चालीस हज़ार रुपये उस पेशेवर आर्टिस्ट ने झूठे बिल बनाने के लिए थे। केदार जी को तो चाय के पैसे मिलना तो दूर जो पाँच हजार रुपये उन्होंने जेब से खर्च किए थे उसके पैसे भी नहीं दिए गए थे जबकि शर्मा जी ने बारह हजार रुपये झूठे बिल लगाकर हड़प लिए थे केदार जी सच्चे आर्टिस्ट थे उन्हें किसी ने धन्यवाद के रूप में एक शब्द तक नहीं कहा था पाँच दिन के बाद जब वे अपनी टेबल पर?आए तै काम का अंबार लगा हुआ था किसी ने उनके काम को हाथ तक नहीं लगाया था रात दिन एक कर के उन्होंने अपना काम निपटाया कार्यक्रम के सफल आयोजन पर बड़े साहब की खूब प्रशंसा हुई। पूरी रात जागकर मंच सजाने वाले केदार जी का किसी ने नाम तक नहीं लिया।
कुछ दिन बाद उस पेशेवर आर्टिस्ट ने केदार जी से कहा आप नौकरी छोडकर मेरे साथ काम करो मैं आपकी तनखा से दुगुना रुपया दूँगा आपके कारण मुझे बहुत सा काम मिल गया जिसमें से कुछ काम ऐसा है जो आपके सिवा कोई और नहीं कर सकता पर केदार जी ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने से साफ इंकार कर दिया। इससे खफा होकर उस पेशेवर आर्टिस्ट ने उनका तबादला इंटीरियर भाग में करा दिया था और केदार जी लाख कोशिशों के बाद भी अपना तबादला रुकवा नहीं पाए थे। कोई उनका साथ नहीं दे रहा था एक सच्चे और अच्छे आर्टिस्ट की परेशानी को दूर करने वाला कोई नहीं था इस संवेदना विहीन समाज में उनसे सहानुभूति प्रकट करने वाला भी कोई नहीं था तबादला रुकवाने के लिए उनके पास साढ़े तीन लाख रुपये नहीं थे इसलिए अपनी बूढ़ी और बीमार माँ को पत्नी के जिम्मे सौंप कर वे दो सौ किलोमीटर स्थित दुर्गम क्षेत्र में नौकरी ज्वाइन करने चल दिए थे। सच्चे कलाकार इस से हटकर और दूसरा अंजाम कैसे हो सकता है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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